एक से एक पंडाल का निर्माण, काली पूजा के रंग में रंगा सिलीगुड़ी

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सिलीगुड़ी : दुर्गापूजा के बाद शहर अब दीपावली व कालीपूजा के रंग में रंग चुका है. शहर के कई जाने-माने क्लबों द्वारा विभिन्न स्थानों पर काली पूजा पंडाल का निर्माण किया गया है़ सिलीगुड़ी में एक पर एक काली पूजा पंडाल बनाए गए हैं. मंगलवार को काली पूजा रहने के बाद भी पंडालों को अंतिम […]

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सिलीगुड़ी : दुर्गापूजा के बाद शहर अब दीपावली व कालीपूजा के रंग में रंग चुका है. शहर के कई जाने-माने क्लबों द्वारा विभिन्न स्थानों पर काली पूजा पंडाल का निर्माण किया गया है़ सिलीगुड़ी में एक पर एक काली पूजा पंडाल बनाए गए हैं.
मंगलवार को काली पूजा रहने के बाद भी पंडालों को अंतिम रूप दिया जा रहा था़ अधिकांश पूजा मंडपों को सजाने का काम शाम तक पूरा नहीं हुआ था. कालीपूजा आयोजक कमेटियों के सदस्यों से बात करने पर उन लोगों ने बताया कि दुर्गापूजा के बाद काली पूजा की तैयारी के लिये बहुत ही कम समय मिला.
जिसकी वजह से पूजा आयोजन का सारा काम बहुत ही जल्दबाजी में हुआ है. कम समय के बाद भी शहर के कई क्लबों ने कालीपूजा की अच्छी तैयारी की है.सेवक रोड, विधान रोड, हिलकर्ट रोड, चंपासारी आदि इलाकों में स्थानीय क्लबों द्वारा कालीपूजा का आयोजन किया गया है. हिलकर्ट रोड स्थित आर.टी.एस क्लब की ओर से भब्य काली पूजा का आयोजन किया गया है. इस क्लब के पूजा पंडाल में भ्रष्ट समाज में मां काली को अशुभ शक्ति के विनाश के लिये प्रकट होते दिखाया गया है.यहां मां काली भोले शंकर के दोनों हाथों पर खड़ी है.
इसके अलावा वीएनसी क्लब, पुराना डुवार्स बस स्टैंड, एयरभ्यू मोड़, राम कृष्ण व्यायाम शिक्षा संघ, उलका क्लब व सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट में भी काली पूजा का आयोजन किया गया है. सिलीगुड़ी के विभिन्न काली पूजा कमेटियों की ओर से आज ही पूजा मंडप का उद्घाटन किया गया. कई पूजा मंडपो का उद्घाटन उत्तर बंगाल विकास मंत्री गौतम देव ने किया. इसके अलावा शहर के महावीरस्थान के आनंदमयी कालीबाड़ी में काली सबसे पूरानी कालीपूजा है. आनंदमयी कालीबाड़ी की स्थापना सन् 1913 में हुई थी.
आनंदमयी काली बाड़ी के पुरोहित विधान चक्रवर्ती ने बताया कि इस मंदिर की स्थापना मुकुंद दास ने करायी थी. उन्होंने काठ का मंदिर बनवाकर काले पत्थर से मां श्यामा की प्रतिमा बनाकर स्थापित करवाइ थी. स्वदेशी आंदोलन के समय आनंदमयी कालीबाड़ी इलाका लाटखोला नाम से परिचित था.
आंदोलन के समय यह मंदिर स्वतंत्रता सेनानियों के अखाड़े के रूप में जाना था. मास्टर दा सूर्य सेन ने स्वयं इस मंदिर के प्रांगण में अंग्रेजो के विरूद्ध लड़ाई की रणनीति बनाते थे और आंदोलनकारियों को सिखाते थे. वर्तमान में आनंदमयी कालीबाड़ी समिति के द्वारा ही काली पूजा का आयोजन होता है.
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