भुखमरी से हो रही है चाय श्रमिकों की मौत
सिलीगुड़ी: उत्तर बंगाल के विभिन्न चाय बागानों में कार्य कर रहे श्रमिकों की स्थिति दयनीय बनी हुई है. इन श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी के साथ-साथ न्यूतम सुविधाएं तक मुहैया नहीं करायी जा रही है. जिसकी वजह से भुखमरी के शिकार होकर चाय श्रमिक मर रहे हैं. यह आरोप छत्तीसगढ़ के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ विनायक सेन […]
सिलीगुड़ी: उत्तर बंगाल के विभिन्न चाय बागानों में कार्य कर रहे श्रमिकों की स्थिति दयनीय बनी हुई है. इन श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी के साथ-साथ न्यूतम सुविधाएं तक मुहैया नहीं करायी जा रही है. जिसकी वजह से भुखमरी के शिकार होकर चाय श्रमिक मर रहे हैं. यह आरोप छत्तीसगढ़ के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ विनायक सेन ने लगाया है. सेन आज सिलीगुड़ी जर्नलिस्ट क्लब में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में रहते वह जब तब उत्तर बंगाल के डुवार्स इलाके में चाय श्रमिकों की मौत की खबर सुनते थे. इन खबरों से वह काफी विचलित होते थे और उन्होंने उत्तर बंगाल के चाय बागानों का दौरा करने का निर्णय लिया. सेन ने बताया कि वह डुवार्स के रायपुर चाय बागान सहित कई चाय बागानों का दौरा करने गये और पाया कि अधिकांश श्रमिकों की मौत भूख की वजह से हुई है.
रायपुर चाय बागान में छह श्रमिकों की मौत हुई है. उन्होंने कहा कि भूख की वजह से श्रमिकों की मौत बेहद दुखद है और राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है. रायपुर चाय बागान में जब श्रमिकों की मौत हुई थी तब राज्य सरकार के चार-चार मंत्री बागान के दौरे पर आये थे.
सभी ने भूख से मरने की बात को नकार दिया था. उसके बाद सरकार की ओर से राशन व्यवस्था चालू करने की बात कही गयी. कुछ ही दिन तक श्रमिकों को राशन मिले और यह व्यवस्था अब बंद है. उन्होंने इस मामले में राज्य सरकार पर पूरी तरह से उदासीन रहने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि राज्य के खाद्य मंत्री ज्योति प्रिय मल्लिक भूख से हुई मौत को अफवाह करार दे रहे हैं. दरअसल वह ऐसा कर अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं. डॉ सेन ने आगे बताया कि वह कई बंद चाय बागानों का दौरा करने भी गये. यहां रह रहे अधिकांश श्रमिक कुपोषण के शिकार हैं. उन्होंने अपने सदस्यों के साथ रेड बैक, बांदा पानी, डायना, कंठालगुड़ी चाय बागान का भी दौरा किया. इन बागानों के श्रम मंत्रियों की स्थिति काफी दयनीय है. इन लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट है. पेट पालने के लिए यह लोग डायना नदी में पत्थर तोड़ने का काम कर रहे हैं.
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