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चार साल से बंद है पानीघटा चाय बागान

Updated at : 21 Apr 2019 1:52 AM (IST)
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चार साल से बंद है पानीघटा चाय बागान

श्रमिकों का अन्य राज्यों में पलायन कुछ नदी में पत्थर तोड़ने पर मजबूर 1400 श्रमिकों का भविष्य अधर में पूरे इलाके की अर्थव्यस्था पर भी असर आमदनी नहीं होने से दुकानों पर भी संकट सिलीगुड़ी : दार्जिलंग संसदीय क्षेत्र में लोकसभा चुनाव का मतदान खत्म हो गया है. चुनाव लड़ रहे सभी उम्मीदवारों की किस्मत […]

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श्रमिकों का अन्य राज्यों में पलायन

कुछ नदी में पत्थर तोड़ने पर मजबूर
1400 श्रमिकों का भविष्य अधर में
पूरे इलाके की अर्थव्यस्था पर भी असर
आमदनी नहीं होने से दुकानों पर भी संकट
सिलीगुड़ी : दार्जिलंग संसदीय क्षेत्र में लोकसभा चुनाव का मतदान खत्म हो गया है. चुनाव लड़ रहे सभी उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद है. उनकी किस्मत का फैसला अगले महीने 23 तारीख को होगा. लेकिन पिछले 4 सालों से भी अधिक समय से बंद पड़े पानीघटा चाय बागान के श्रमिकों के किस्मत का फैसला कौन करेगा, यह कोई नहीं जानता.
यहां के करीब 14 सौ श्रमिक बागान बंद होने से भुखमरी के कगार पर हैं. कईयों ने तो दूसरे चाय बागानों में काम शुरू कर दिया है तो कई महानंदा तथा अन्य नदियों में गिट्टी पत्थर तोड़ने का काम कर रहे हैं. चुनाव परिणाम क्या आएगा इसको लेकर यहां के श्रमिकों में कोई दिलचस्पी नहीं है.
यह लोग तो बस किसी तरह से बंद पड़े चाय बागान को खोलने की गुहार लगा रहे हैं. पिछले दिनों चाय बागान के श्रमिकों ने भी मतदान किया है. इस मतदान से उनकी किस्मत बदल जाएगी इस बात पर उन्हें भरोसा नहीं है. ऐसा नहीं है कि बागान बंद होने से सिर्फ पानीघटा चाय बागान के मजदूर ही परेशान हैं. वास्तविकता यह है कि पानीघटा इलाके की पूरी अर्थव्यवस्था ही चरमरा गई है. यदि चाय बागान के मजदूर पैसे ही नहीं कमाएंगे तो भला यहां के दुकानों में खरीदारी कैसे करेंगे. यही वजह है कि पानीघटा इलाके के दुकानदार भी आर्थिक संकट की मार झेल रहे हैं.
यहां के व्यवसाई अनिल शर्मा, दिल बहादुर आदि का कहना है कि 4 साल से भी अधिक समय से बागान बंद है. कारोबार काफी मंदा हो चला है. वह लोग भी चाहते हैं कि बागान खुले. यदि मजदूर पैसा कमाने लगेंगे तो उनका कारोबार भी चलने लगेगा. दूसरी ओर इस चाय बागान फैक्ट्री के चौकीदार गोपाल छेत्री, श्रमिक मनमाया राय, सुनीता थापा आदि का कहना है कि बागान बंद होने से भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई .है कहीं भी रोजी रोजगार का साधन उपलब्ध नहीं है. पिछले 4 सालों से भी अधिक समय से बागान खोलने की मांग कर रहे हैं.
लेकिन ना तो बागान मालिकों ने और ना ही सरकार ने इस दिशा में कोई पहल की. बाध्य होकर रोजी रोजगार के दूसरे साधन तलाशने पड़ रहे हैं. कुछ मजदूरों ने तो नदी में पत्थर तोड़ने का काम शुरू कर दिया है. जबकि कुछ युवा श्रमिक रोजी रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में चले गए हैं. बागान बंद होने से चाय के पौधों की देखरेख भी नहीं हो पा रही है.
अब उजाड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है. गोजमुमो विनय तमांग गुट के नेता तथा पानीघटा सुकना अंचल के अध्यक्ष जी तमांग ने भी बागान बंद होने पर अपनी चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव से पहले यहां नेताओं की आवाजाही हुई थी. वोट मांगने के लिए कई नेता आए थे. तब ऐसा लग रहा था कि बागान खोलने की दिशा में कोई सार्थक पहल होगी. अब जब मतदान संपन्न हो गया है तो दूर-दूर तक बागान खोले जाने के आसार नहीं दिख रहे हैं. कुछ इसी तरह की बातें तृणमूल ट्रेड यूनियन के नेता किशोर प्रधान ने कही.
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