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कभी वाममोर्चा का गढ़ हुआ करता था अलीपुरद्वार

Updated at : 01 Apr 2019 6:39 AM (IST)
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कभी वाममोर्चा का गढ़ हुआ करता था अलीपुरद्वार

सिलीगुड़ी : र्जिलिंग संसदीय क्षेत्र में पड़ने वाले सिलीगुड़ी के लोगों की निगाहें अपने संसदीय क्षेत्र के साथ-साथ अलीपुरद्वार संसदीय सीट पर भी लगी हुई है, क्योंकि यह संसदीय क्षेत्र डुवार्स को लेकर बना है. डुवार्स क्षेत्र में कई सारे चाय बागान हैं एवं पिछले कुछ वर्षों के दौरान वहां पर्यटन कारोबार भी पूरे उफान […]

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सिलीगुड़ी : र्जिलिंग संसदीय क्षेत्र में पड़ने वाले सिलीगुड़ी के लोगों की निगाहें अपने संसदीय क्षेत्र के साथ-साथ अलीपुरद्वार संसदीय सीट पर भी लगी हुई है, क्योंकि यह संसदीय क्षेत्र डुवार्स को लेकर बना है.
डुवार्स क्षेत्र में कई सारे चाय बागान हैं एवं पिछले कुछ वर्षों के दौरान वहां पर्यटन कारोबार भी पूरे उफान पर है. चाय बागानों के अधिकांश मालिक या उनके मैनेजर सिलीगुड़ी में रहते हैं.
इसी तरह से वहां पर्यटन कारोबार चलाने वाले व्यवसायियों का घर भी सिलीगुड़ी में है. जाहिर तौर पर सिलीगुड़ी के काफी लोगों की दिलचस्पी दार्जिलिंग संसदीय सीट के साथ-साथ जलपाईगुड़ी एवं अलीपुरद्वार सीट को लेकर भी रहती है.
अलीपुरद्वार सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. चाय बागान बहुल इलाका होने के कारण यहां आदिवासियों की संख्या काफी अधिक है. एक तरह से कहें तो चाय बागानों के श्रमिक ही अलीपुरद्वार सीट पर उम्मीदवारों का भाग्य तय करते हैं. अलीपुरद्वार सीट शुरू से ही वाममोर्चा का गढ़ रहा था.
यहां वाममोर्चा के आगे किसी भी पार्टी की एक नहीं चलती थी. वर्ष 1977 से लेकर वर्ष 2009 तक यहां वाममोर्चा की तूती बोलती थी. लेकिन राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद वाममोर्चा का यह लाल दुर्ग भी पूरी तरह से ध्वस्त हो गया.
चुनाव आयोग द्वारा मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 1977 से 2009 तक लगातार इस सीट से वाममोर्चा समर्थित आरएसपी उम्मीदवारों की जीत हुई. आरएसपी के पीयूष तिर्की लगातार चार बार अलीपुरद्वार के सांसद रहे. उनके हटने के बाद आरएसपी के ही जोवाकिम बाकला भी लगातार चार बार अलीपुरद्वार के सांसद रहे.
चुनाव आयोग ने जो आंकड़ा दिया है उसके अनुसार इस सीट पर हमेशा ही वाममोर्चा एवं कांग्रेस के बीच मुकाबला हुआ. 1977 में पीयूष तिर्की ने कांग्रेस के टूना उरांव को करीब 40 हजार मतों से पराजित किया था. तब पीयूष तिर्की एक लाख 67 हजार 865 तो टूना उरांव एक लाख 27 हजार 297 वोट पाने में सफल रहे.
वर्ष 1980 के चुनाव में पीयूष तिर्की के जीत का आंकड़ा दोगुना से भी अधिक हो गया. पीयूष तिर्की ने दो लाख 43 हजार 485 वोट लेकर कांग्रेस के ही टूना उरांव को हराया. श्री उरांव तब एक लाख 28 हजार 28 वोट ही पा सके थे. 1984 के चुनाव में पीयूष तिर्की एक बार फिर से मैदान में थे, जबकि कांग्रेस का कमान फिलिप मिंज के हाथों में था.
उस समय इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में कांग्रेस की लहर थी, लेकिन तब भी कांग्रेस के फिलिप मिंज ने आरएसपी के पीयूष तिर्की को कड़ी चुनौती तो दी, लेकिन चुनाव में हरा नहीं सके. तब पीयूष तिर्की को दो लाख 78 हजार 358 तो फिलिप मिंज को दो लाख 48 हजार 176 वोट प्राप्त हुआ था.
1991 में एक बार फिर से आरएसपी के पीयूष तिर्की तथा कांग्रेस के फिलिप मिंज मैदान में थे. तब एक बार फिर से पीयूष तिर्की ने फिलिप मिंज को मात दी. पीयूष तिर्की तीन लाख 65 हजार 370 तो फिलिप मिंज दो लाख 35 हजार 258 वोट ही पा सके थे. 1996 के लोकसभा चुनाव में पीयूष तिर्की एक बार फिर से मैदान में थे लेकिन उनका टिकट बदल गया था.
आरएसपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया था जिससे नाराज होकर पीयूष तिर्की कांग्रेस में शामिल हो गये और कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे. पार्टी बदलने के साथ ही उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा. तब आरएसपी के जोवाकिम बाकला मैदान में थे. उन्होंने कभी अपने बॉस रहे पीयूष तिर्की को करीब एक लाख 35 हजार वोटों से हरा दिया.
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1998 में फिर हुआ चुनाव
1998 में फिर चुनाव हुआ और आरएसपी के जोवाकिम बाकला एक बार फिर से मैदान में थे. 1998 में भाजपा ने इस इलाके में अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी थी. इसका उन्हें फायदा भी हुआ. तब मुख्य मुकाबला जोवाकिम बाकला एवं भाजपा उम्मीदवार धीरेन्द्र नार्जीनारी के बीच हुआ.
जिसमें जीत आरएसपी उम्मीदवार जोवाकिम बाकला की हुई. वह चार लाख 15 हजार 6 वोट लाने में सफल रहे थे. जबकि भाजपा के धीरेन्द्र नार्जीनारी मात्र दो लाख 19 हजार 407 वोट ही प्राप्त कर सके.
उसके बाद आने वाले 1999 एवं 2004 के चुनाव में इस सीट पर मुख्य मुकाबला आरएसपी एवं भाजपा के बीच ही हुआ. 1999 में आरएसपी की ओर से जोवाकिम बाकला तथा भाजपा की ओर से धीरेन्द्र नार्जीनारी फिर मैदान में थे.
तब भी जोवाकिम बाकला की जीत हुई थी. 2004 के चुनाव में भी आरएसपी के जोवाकिम बाकला का मुख्य मुकाबला भाजपा के मनोज तिग्गा से हुआ. तब भी जोवाकिम बाकला जीत गये थे.
2009 के चुनाव में बदली परिस्थिति
वर्ष 2009 के चुनाव में यहां परिस्थिति फिर से बदल गई. भाजपा के स्थान पर तृणमूल कांग्रेस वाममोर्चा के साथ मुख्य मुकाबले में आ गई. तब आरएसपी के मनोहर तिर्की ने तृणमूल कांग्रेस के पवन कुमार लाकड़ा को हराया था.
मनोहर तिर्की तीन लाख 84 हजार 890 के मुकाबले पवन कुमार लाकड़ा दो लाख 72 हजार 78 वोट ही पा सके थे. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां की परिस्थिति पूरी तरह से बदल गई थी. तब पूरे राज्य के साथ-साथ अलीपुरद्वार में भी वाममोर्चा का पतन हो चुका था और तृणमूल कांग्रेस एक नयी शक्ति बनकर राज्य में सत्तारूढ़ हो चुकी थी. वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी की लहर थी.
उसके बाद भी इस सीट पर ममता लहर ही देखने को मिला. ममता लहर में आरएसपी के वाम उम्मीदवार मनोहर तिर्की पूरी तरह से बह गये. तृणमूल कांग्रेस के दशरथ तिर्की यहां से चुनाव जीतने में सफल रहे. उन्होंने आरएसपी के मनोहर तिर्की को करीब 20 हजार मतों से पराजित किया था.
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