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सिलीगुड़ी : डीड की ओरिजनल कॉपी गायब, बढ़ा रहस्य, फर्जीवाड़े के खुलासे का दौर जारी

Updated at : 15 Feb 2019 3:39 AM (IST)
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सिलीगुड़ी :  डीड की ओरिजनल कॉपी गायब, बढ़ा रहस्य, फर्जीवाड़े के खुलासे का दौर जारी

सिलीगुड़ी : उत्तर बंगाल में कच्चा माल की सबसे बड़ी थोक मंडी सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट में स्टॉलों के आवंटन या हस्तांतरण में फर्जीवाड़े ने सारा रिकार्ड तोड़ दिया है. फर्जीवाड़े के एक से एक मामले सामने आ रहे हैं. आवंटित स्टॉल के डीड, डीड के अनुसार पूर्व मालिक व उनके साथ की गयी साझेदारी के […]

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सिलीगुड़ी : उत्तर बंगाल में कच्चा माल की सबसे बड़ी थोक मंडी सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट में स्टॉलों के आवंटन या हस्तांतरण में फर्जीवाड़े ने सारा रिकार्ड तोड़ दिया है. फर्जीवाड़े के एक से एक मामले सामने आ रहे हैं. आवंटित स्टॉल के डीड, डीड के अनुसार पूर्व मालिक व उनके साथ की गयी साझेदारी के डीड व अन्य दस्तावेज तक वर्तमान काबिज के पास नहीं हैं. बल्कि अवैध तरीके से तैयार किये गये स्टॉल आवंटन के डीड की एक भी मूल ओरिजनल कॉपी सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट कमेटी (एसआरएमसी) कार्यालय में भी नहीं है.

इसबीच,सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट में स्टॉलों के आवंटन या हस्तांतरण घोटाला मामले में और एक नया रहस्य सामने आया है. प्राप्त दस्तावेजों के मुताबिक सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट का स्टॉल नंबर एपी-17 सर्वप्रथम लक्ष्मी नारायण साह को आवंटित किया गया. एपी-17 नंबर स्टॉल मार्केट के फल-सब्जी यार्ड में स्थित है.
लक्ष्मी नारायण साह के नाम पर आवंटित होने के बाद भी एसआरएमसी व लक्ष्मी नारायण साह के बीच कोई एग्रीमेंट नहीं हुआ. लक्ष्मी नारायण साह भारत-भूटान सीमांत जयगांव के निवासी हैं. इसलिए बाद में उन्होंने भी एग्रीमेंट के लिए दिलचस्पी नहीं दिखायी. आवंटन के बाद से बंद रहने वाला यह स्टॉल पिछले कई वर्षों से सुनील राय नाम के एक व्यवसायी के कब्जे में है. स्टेट मार्केटिंग बोर्ड के नियमों की धज्जियां उड़ाकर 1 अक्तूबर 2018 को यह स्टॉल वर्तमान काबिज सुनील राय के नाम से एसआरएमसी ने आवंटित कर दिया.
डीड भी बनायी गयी. डीड पर दार्जिलिंग जिला शासक सह एसआरएमसी की चेयरपर्सन जयशी दासगुप्ता, सचिव देवज्योति सरकार, गवाह के रूप में एसआरएमसी के क्लर्क समीरन चटर्जी व वर्तमान काबिज व पट्टेदार सुनील राय के भी हस्ताक्षर हैं. चेयरपर्सन व सचिव ने पहले ही अपने दस्तखत को फर्जी करार दे दिया है. क्लर्क इस संबंध में कुछ बोल नहीं रहे हैं. लेकिन गोल-गोल शब्दों में सुनील राय ने अपने दस्तखत को स्वीकार कर लिया है.
इसके अतिरिक्त 1 अक्टूबर को स्टॉल आवंटन की डीड जारी की गयी और उसने 5 अक्तूबर को मनी रसीद नंबर 19935 के जरिए पचास हजार रूपए की नन रिफंडेबल सलामी भी जमा करायी गयी है. लेकिन उसके पास डीड की ओरिजनल प्रति नहीं है. इसके अतिरिक्त सुनील राय को आवंटित डीड में स्टॉल के पूर्व मालिक की डीड, उसके साथ सुनील राय के साझेदारी की डीड, साझेदारी खंडित करने की डीड का जिक्र तो किया गया है, लेकिन ऐसा एक भी दस्तावेज एसआरएमसी के रिकॉर्ड में नहीं है.
ऐसे में एसआरएमसी की भूमिका पर सवाल खड़ा होने के कई कारण हैं. एक तरफ 1997 में ई-4 स्टॉल जगन्नाथ यादव को आवंटित होने के बाद भी उसके साथ एग्रीमेंट नहीं किया गया. जबकि एग्रीमेंट व किराया जमा कराने की व्यवस्था करने के लिए उसने कई बार एसआरएमसी से अपील की. बल्कि किराया बकाया रहने की वजह से एसआरएमसी ने उसके स्टॉल पर ताला जड़ दिया. यह स्टॉल अभी भी बंद है. वहीं किराया बकाया रहने की वजह से एपी-17 में ताला जड़ने के दूसरे दिन ही ताला खोल दिया गया.
इसके भीतर का रहस्य होश उड़ाने के लिए काफी है. प्राप्त जानकारी के मुताबिक जब लक्ष्मी नारायण के साथ सुनील राय की कोई साझेदारी हुयी ही नहीं तो फिर साझेदारी खंडित कर स्टॉल उसके नाम पर कैसे किया गया. दूसरा सवाल यह कि यह स्टॉल पहले से लक्ष्मी नारायण साह के नाम आवंटित था तो फिर सुनील राय ने बिना किसी दस्तावेज के किस बिना पर किराये की रकम अदा कर दी. तीसरा सवाल यह कि एक ही रात में ऐसा क्या हुआ कि ताला जड़ने के अगले ही दिन उसका स्टॉल खोल दिया गया. बल्कि एपी-16 की तरह उसे भी 100 वर्गफीट का बारामदा मुफ्त में आवंटित कर दिया गया. अवैध तरीके से बने डीड पर सुनील राय को 90 वर्गफीट का स्टॉल से बड़ा 100 वर्गफीट का बारामदा भी आवंटित किया गया. जिसका डीड में कोई जिक्र नहीं है.
स्टॉल एपी-17 के वर्तमान काबिज सुनील राय को यह तक पता नहीं कि इस स्टॉल का पूर्व मालिक कौन था .सुनील राय ने इस स्टॉल की पूर्व मालिक किसी सरिता सिन्हा को बताया है. उन्ही के साथ साझेदारी थी. बाद में यह स्टॉल उन्हें सौंप दिया गया. फिर जब स्टॉल में ताला लगाया तो बकाया किराया जमा करा कर उसने अगले ही दिन स्टॉल खुलवाया.दूसरों की देखादेखी उसने भी वर्तमान काबिज का फॉर्म भरकर स्टॉल को अपने नाम पर कराया और पचास हजार रूपया भी जमा कराया. डीड की कॉपी पर भले ही उसका दस्तखत है लेकिन मूल प्रति उनके पास नहीं है.
इसके अतिरिक्त जो सबसे बड़ी बात सामने आयी है उसके अनुसार फर्जीवाड़े का मामला सामने आने के बाद 1 अक्टूबर 2018 से 16 जनवरी 2019 के बीच अवैध तरीके से आवंटित स्टॉलों की डीड की अरिजनल कॉपी सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट कमेटी के कार्यालय में नहीं मिल रही है. प्रभात खबर ने बीते सात फरवरी गुरूवार को सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट में दुकानों के आवंटन में घपले की खबर प्रकाशित की थी. मामला सामने आने के बाद से ही एसआरएमसी की चेयरपर्सन सह जिला शासक ने ओरिजनल डीड व दस्तावेजों की खोज शुरू की.
बीते शुक्रवार से एसआरएमसी के सचिव देवज्योति सरकार कार्यालय नहीं आ रहे हैं.इन विवादित डीड व फर्जीवाड़े से जुड़े अन्य दस्तावेज की ओरिजनल प्रति भी कार्यालय में नहीं मिल रहा है. घोटाले का रहस्य दिन प्रतिदिन गहराता जा रहा है. चेयरपर्सन सह जिला शासक जयशी दासगुप्ता ने बताया कि अभी तक विवादित स्टॉलों के डीड की डीड को ओरिजनल कॉपी नहीं मिली है.
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