18.1 C
Ranchi

लेटेस्ट वीडियो

गोबर से बनी लकड़ी से चिता सजा समाज को दिखायी नयी राह

सिलीगुड़ी : जीते जी तो आज संभवत: हर कोई जरूतमंद इंसान की सेवा करता है लेकिन मृत इंसान का नि:स्वार्थ सेवा विरले ही करते हैं. ऐसे ही अनोखे समाजसेवी श्याम मईया हैं जो बीते 20-25 वर्षों में अब-तक तकरीबन 1400 मृत शरीर का दाह-संस्कार करवा चुके हैं. उन्होंने आज और एक आयाम पूरा करके समाज […]

सिलीगुड़ी : जीते जी तो आज संभवत: हर कोई जरूतमंद इंसान की सेवा करता है लेकिन मृत इंसान का नि:स्वार्थ सेवा विरले ही करते हैं. ऐसे ही अनोखे समाजसेवी श्याम मईया हैं जो बीते 20-25 वर्षों में अब-तक तकरीबन 1400 मृत शरीर का दाह-संस्कार करवा चुके हैं. उन्होंने आज और एक आयाम पूरा करके समाज को एकबार फिर नयी राह दिखा दी है. श्री मईया ने गोबर से बने गोकाष्ठ (कंडो और गोयठा) से चिता जलाकर पूरे उत्तर बंगाल में इतिहास रच डाला.
इस इतिहास का गवाह बने स्वर्गीय महेंद्र अग्रवाल के परिवार वाले और सिलीगुड़ी के सैकड़ों मारवाड़ी समाज के लोग. सोमवार दोपहर को श्री मईया ने स्थानीय पांच नंबर वार्ड के नूतन पाड़ा स्थित श्मशान घाट ‘रामघाट’ में लकड़ी के जगह गोकाष्ठ से चिता सजायी. इस चिते पर स्थानीय आश्रमपाड़ा निवासी स्वर्गीय महेंद्र अग्रवाल (इलामवाले) का विधिवत रुप से दाह-संस्कार करवाया. इस दौरान लकड़ी का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ और घी भी काफी मामूली मात्रा में इस्तेमाल हुआ.
कैसे बनती है गोकाष्ठ
श्याम मईंया ने बताया कि गोकाष्ठ बनाने में गाय के गोबर के अलावा पाट वाली संठी, पुआल व बेंत का इस्तेमाल किया जाता है. पुआल की आंटी पर गोबर का लेप चढ़ाकर लकड़ी के सिल्ली का रुप दिया जाता है. इसके अलावा कई संठी या बेंतों को बांधकर उसपर भी गोबर का लेप चढ़ा कर कड़ी धूप में सूखाया जाता है. सूखने के बाद यही गोकाष्ठ बन जाता है. इसके अलावा गोयठा भी बनवाया जाता है. चिता जलाने में गोयठा का भी इस्तेमाल होता है.
कैसे मिली प्रेरणा
श्याम मइया की माने तो जयपुर, कोलकाता समेत देश भर में कई बड़े शहरों में चिता जलाने के लिए इसी विधि का इस्तेमाल शुरु हो चुका है. कुछ महीनों पहले सोशल मीडिया पर गोकाष्ठ से बने चिता और दाह-संस्कार की वीडियो देखकर प्रेरणा जागृत हुई. इसके लिए कई शहरों का दौरा कर सर्वे किया और विस्तृत रुप से इसका अध्ययन भी किया. गोकाष्ठ की पूरी जानकारी लेने के बाद समाज के कई लोगों से इस पर चर्चा भी की. सबों ने इसके लिए प्रोत्साहित किया. पूरे समाज की रजामंदी के बाद उन्होंने गोकाष्ठ का निर्माण करने में दिन-रात एक कर दिया.
कई ग्रामीण जुटे रोजगार में
श्याम मईंया ने बताया कि कई महीनों तक गोकाष्ठ के चिते का सर्वे और अध्ययन करने के बाद स्थानीय फूलबाड़ी क्षेत्र के बोर्डर इलाके के कुछ ग्रामीण को समझा-बुझाकर इस रोजगार को शुरू करने के लिए तैयार किया. गोकाष्ठ बनाने के लिए पहले एक ग्रामीण परिवार को उन्होंने खुद प्रशिक्षत किया. आस-पास के कई ग्रामीण भी इस रोजगार से जुड़ने लगे हैं. अब जैसे-जैसे चिता के लिए गोकाष्ठ की मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे ग्रामीणों का भी रोजगार बढ़ेगा. अब श्री मईंया इस प्रोजेक्ट को और विस्तृत रूप देने की भी योजना बना रहे हैं.
गोशाला कमेटी से भी सहयोग
श्री दार्जिलिंग-सिलीगुड़ी गोशाला कमेटी ने भी गोकाष्ठ प्रोजेक्ट स्थापित करने हेतु कवायद शुरु कर दी है. कमेटी के सचिव बनवारी लाल करनानी के अनुसार इस प्रोजेक्ट के तहत गोकाष्ठ हाथ से नहीं बल्कि अत्याधुनिक मशीन से निर्मित किया जायेगा. इसके लिए गुजरात व हरियाणा की कंपनियों से संपर्क भी साधा जा रहा है. मशीनों के खरीदारी होते ही बहुत जल्द गोशाला में गोकाष्ठ बनाने का काम शुरु कर दिया जायेगा. श्री करनानी का कहना है कि इससे कुछ लोगों को रोजगार का अवसर मिलेगा और गोशाला की आमदनी में काफी हद तक इजाफा भी होगी, जो गोपालन में ही खर्च होगा. साथ ही गोकाष्ठ का इस्तेमाल भी एक अच्छे कार्य में ही होगा.
होगा कम खर्च और बचेगा पर्यावरण
श्याम मईया का मानना है कि गोकाष्ठ से दाह-संस्कार किये जाने से एक और जहां फिजूलखर्ची में काफी हद तक लगाम लगेगी वहीं, पर्यावरण को भी प्रदूषण से बचाने में नयी कवायद शुरु होगी. श्री मईया का कहना है कि सनातन धर्म में मृत इंसान का दाह-संस्कार आम की लकड़ी, चंदन की लकड़ी के अलावा घी से करने का रिवाज है. खासतौर पर मारवाड़ी समाज आज भी विद्युत चुल्ही के बजाय लकड़ी के बने चिता पर ही अपने परिवार के मृत सदस्य को अंतिम विदायी देने का रिवाज बरकरार है.
एक इंसान का चिता जलाने में तकरीबन साढ़े तीन क्विंटल आम की लकड़ी और तकरीबन एक किलो चंदन लकड़ी का इस्तेमाल हो जाता है. आज के बाजार में साढ़े तीन क्विंटल लकड़ी की कीमत करीब पांच हजार रुपये और 10 किलो घी (करीब चार हजार रुपये) का इस्तेमाल हो जाता है. लेकिन गोकाष्ठ का चिता काफी कम खर्च में ही पूरा हो जाता है और घी भी मात्र दो-अढ़ाई किलो ही इस्तेमाल होता है.
श्री मईयां का कहना है कि लकड़ी का चिता जलाने में काफी असुविधाओं का भी सामना कई बार करना पड़ता है. लेकिन गोकाष्ठ के चिता में उस तरह की परेशानियां काफी हद तक कम हो जायेगी. श्री मईंया के इस सफल प्रयास का सिलीगुड़ी का समस्त समाज और पर्यायवरण प्रेमी भी काफी तारीफ कर रहे हैं.
Prabhat Khabar Digital Desk
Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

संबंधित ख़बरें

Trending News

जरूर पढ़ें

वायरल खबरें

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel