निलंबन से भड़के कबीर ने नयी पार्टी बनाने का किया एलान

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निलंबन से भड़के कबीर ने नयी पार्टी बनाने का किया एलान

तृणमूल कांग्रेस विधायक हुमायूं कबीर को गुरुवार को पार्टी से निलंबन की सूचना उस समय मिली जब वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुर्शिदाबाद की रैली में मौजूद थे.

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संवाददाता, कोलकातातृणमूल कांग्रेस विधायक हुमायूं कबीर को गुरुवार को पार्टी से निलंबन की सूचना उस समय मिली जब वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुर्शिदाबाद की रैली में मौजूद थे. पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते निलंबन की खबर मिलते ही मुर्शिदाबाद के भरतपुर से विधायक हुमायूं कबीर सुश्री बनर्जी की सभा स्थल से भड़ककर बाहर निकल आये. बाहर आते ही उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वह अब तृणमूल में नहीं रहेंगे और 22 दिसंबर को मुर्शिदाबाद में नया राजनीतिक दल बनायेंगे.

उन्होंने कहा कि वह अगले वर्ष राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में 294 सीटों में से 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे. कबीर ने कहा: मुझे कोई निलंबन पत्र नहीं मिला है, लेकिन मैं शुक्रवार या सोमवार को विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दूंगा. उन्होंने आरोप लगाया: मैं धर्मनिरपेक्ष राजनीति पर तृणमूल के दोहरे रवैये को उजागर कर दूंगा. तृणमूल अल्पसंख्यकों को मूर्ख बना रही है और आरएसएस-भाजपा के साथ मिली हुई है. उन्होंने आगे कहा कि छह दिसंबर का उनका कार्यक्रम तय है. अगर प्रशासन ने बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की आधारशिला रखने से रोका, तो वह धरने पर बैठ जायेंगे और गिरफ्तारी देंगे. कबीर ने कहा: राज्य से तृणमूल को हटाकर इसका जवाब दिया जायेगा. मैं मुसलमान हूं, बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा के लिये मुझे सस्पेंड किया गया है. मेरी जान चली जाये तो जाये, मैं पीछे नहीं हटूंगा. छह दिसंबर को शिलान्यास होकर रहेगा.

तृणमूल की कार्रवाई पहले से संभावित थी :

पार्टी सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों से हुमायूं कबीर की बयानबाजी और सार्वजनिक विरोध को देखते हुए यह फैसला तय माना जा रहा था. हालांकि, कबीर का यह विवाद नया नहीं है. वर्ष 2015 में भी उन्हें तृणमूल से छह साल के लिये निलंबित किया गया था. बाद में वह कांग्रेस में गये, फिर भाजपा में शामिल हुए और 2019 के लोकसभा चुनाव में मुर्शिदाबाद से भाजपा उम्मीदवार भी बने. वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले वह फिर तृणमूल में लौट आये और भरतपुर सीट से जीतकर विधायक बने. 2021 में विधायक बनने के बाद भी कबीर कई विवादित बयान देकर पार्टी नेतृत्व की नाराजगी झेलते रहे. कई बार शोकॉज मिलने के बाद माफी मांगकर उन्होंने मुद्दों पर फिर बयानबाजी दोहरायी. विधानसभा चुनाव नजदीक होने के चलते नेतृत्व अब कोई जोखिम लेने के पक्ष में नहीं था.

छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद निर्माण का एलान ही विवाद की जड़ :

कबीर के बेलडांगा में छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद निर्माण की घोषणा ने तृणमूल नेतृत्व को पूरी तरह नाराज कर दिया. यह कदम पार्टी लाइन से बिल्कुल उलट था. तृणमूल नेताओं का कहना है कि बार-बार चेतावनी देने के बाद भी उन्होंने अपने रुख में नरमी नहीं दिखायी. मंत्री फिरहाद हकीम ने कहा था कि हुमायूं कबीर की ऐसी राजनीति का पार्टी समर्थन नहीं करती है. मुर्शिदाबाद में कबीर का अपना जनाधार माना जाता है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वह अब फिर साबित करना चाहते हैं कि पार्टी के बिना भी उनकी राजनीतिक ताकत बनी रहेगी. वहीं तृणमूल को आशंका है कि चुनावी साल में उनकी यह बगावत विपक्षी दलों के लिये लाभ का मौका बन सकती है. 22 दिसंबर के बाद कबीर का राजनीतिक कदम राज्य की राजनीति में नयी हलचल पैदा कर सकता है.

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