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अवैध बर्खास्तगी मामले में मुआवजे के साथ कर्मचारी को करना होगा पुनर्बहाल

Updated at : 03 Jul 2025 11:14 PM (IST)
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अवैध बर्खास्तगी मामले में मुआवजे के साथ कर्मचारी को करना होगा पुनर्बहाल

कलकत्ता हाइकोर्ट की एक सिंगल जज बेंच ने लेबर कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें एक बस चालक को बहाल करने से इनकार कर दिया गया था, जबकि उसकी बर्खास्तगी को अवैध पाया गया था. मामले की सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट के न्यायाधीश राजा बसु चौधरी ने कहा कि जब बर्खास्तगी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है, तो केवल मुआवजा देने के बजाय बहाली प्रदान की जानी चाहिए.

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कोलकाता.

कलकत्ता हाइकोर्ट की एक सिंगल जज बेंच ने लेबर कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें एक बस चालक को बहाल करने से इनकार कर दिया गया था, जबकि उसकी बर्खास्तगी को अवैध पाया गया था. मामले की सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट के न्यायाधीश राजा बसु चौधरी ने कहा कि जब बर्खास्तगी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है, तो केवल मुआवजा देने के बजाय बहाली प्रदान की जानी चाहिए.

क्या है मामला : गौरतलब है कि सी चिदंबरम ने 2008 से परिवहन निदेशालय के लिए दैनिक किराये के एक बस चालक के रूप में काम किया. उनका कार्यकाल 2015 तक बिना किसी रुकावट के बढ़ाया गया था. हालांकि, 2014 में उन पर एक सरकारी बस से 20 लीटर से अधिक पेट्रोल चोरी करने का आरोप लगाया गया था. इस घटना में सी चिंदबरम के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की गयी और फिर उन्हें गिरफ्तार भी किया गया.

जमानत पर रिहा होने के बाद, उन्होंने काम पर वापस लौटने के लिए अपने नियोक्ता से संपर्क किया. कई लिखित अभ्यावेदन के बावजूद, निदेशालय ने उन्हें शामिल होने से मना कर दिया. जुलाई 2015 में, सी चिदंबरम के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, जिसमें एफआइआर और गिरफ्तारी को ””गंभीर कदाचार”” के रूप में संदर्भित किया गया था. श्री चिदंबरम ने इसका जवाब देते हुए कहा कि उनके खिलाफ मामला दो वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा केवल प्रतिशोध था. इसके बावजूद, अक्तूबर 2015 में, निदेशालय ने उनकी गिरफ्तारी की तारीख से पूर्वव्यापी रूप से उनकी सेवाओं को समाप्त करने का आदेश जारी किया. इसके खिलाफ चिदंबरम ने कलकत्ता हाइकोर्ट में याचिका दायर की. इस पर सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट के न्यायाधीश ने कहा कि चिदंबरम की सेवा समाप्ति से पहले की कार्यवाही में कई प्रक्रियात्मक खामियां थीं. मुख्य गवाह का बयान उसकी अनुपस्थिति में दर्ज किया गया, जिरह करने का कोई अवसर नहीं दिया गया और साक्ष्य प्रस्तुत करने का भी कोई मौका नहीं दिया गया. न्यायालय ने पाया कि सेवा समाप्ति केवल एक प्राथमिकी पर आधारित थी और उसके बरी होने के पश्चात भी कोई विभागीय जांच नहीं की गयी. न्यायालय ने कहा कि इससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है. इसके अलावा, न्यायालय ने कहा कि जब यह पाया गया कि बर्खास्तगी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है, तो श्रम न्यायालय को बहाली सहित पूर्ण राहत प्रदान करनी चाहिए.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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BIJAY KUMAR

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By BIJAY KUMAR

BIJAY KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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