न्यायाधीश की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के अपने फैसले को हाइकोर्ट ने किया रद्द, एक लाख लगाया जुर्माना
Updated at : 08 Jul 2019 1:57 AM (IST)
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कोलकाता : कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के एक न्यायाधीश की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के अपने ही आदेश को रद्द करते हुए उन्हें दोबारा बहाल करने का आदेश दिया. इसके साथ ही अदालन ने अपने को ही एक लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए उक्त पीड़ित न्यायाधीश को जुर्माने की राशि देने का निर्देश दिया. […]
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कोलकाता : कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के एक न्यायाधीश की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के अपने ही आदेश को रद्द करते हुए उन्हें दोबारा बहाल करने का आदेश दिया. इसके साथ ही अदालन ने अपने को ही एक लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए उक्त पीड़ित न्यायाधीश को जुर्माने की राशि देने का निर्देश दिया.
सियालदह अदालत में रेलवे मजिस्ट्रेट और जज मिंटू मलिक को अपने अधिकार क्षेत्र से आगे जाकर काम करने के मामले में उच्च न्यायालय ने 2007 में निलंबित कर दिया गया था और उन्हें 2013 में अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा सुनाई गई थी. रेलवे मजिस्ट्रेट ने 2007 में एक लोकल ट्रेन के चालक व गार्ड को परिचालन में लापरवाही बरतने और ट्रेन के देरी से अपन गंतव्य पर पहुंचने के कारण तलब किया था.
गुरुवार को मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजीव बनर्जी और सुव्रा घोष ने कहा कि भले ही न्यायाधीश दोषी साबित हुए थे लेकिन उन्हें दी गई सजा अनुचित और हैरान करने वाली है. पीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रशासन को एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया और आदेश दिया कि यह राशि अपील करने वाले रेलवे मजिस्ट्रेट और जज मिंटू मलिक को दी जाए.
गौरलतब है कि रेलवे मजिस्ट्रेट मिंटू 5 मई 2007 की सुबह दक्षिण कोलकाता के लेक गार्डन जाने के लिए बजबज सियालदह मार्ग पर एक रेलवे स्टेशन पर खड़े हो कर लोकल ट्रेन का इंतजार कर रहे थे. उस वक्त वह सियालदह मंडल के रेलवे मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे. पूछने पर उन्हें यात्रियों ने बताया कि उक्त ट्रेन अक्सर विलंब से चलती है. उस दिन भी ट्रेन विलंब से आई. ट्रेन आने पर रेलवे मजिस्ट्रेट ने चालक के केबिन में जा कर विलंब का कारण पूछा.
संतोषजनक जवाब न मिलने पर उन्होंने अगले दिन चालक और गार्ड को रेलवे मजिस्ट्रेट की अदालत में तलब किया. अगले दिन चालक एवं गार्ड अदालत के समक्ष पेश हुए और स्पष्टीकरण दिया, लेकिन इसी दौरान कुछ रेलकर्मियों ने सियालदह अदालत कक्ष के सामने नारेबाजी की और आपत्तिजनक भाषा का उपयोग किया. इसके बाद आपराधिक दंड संहिता के तहत कार्रवाई की गई.
इस पर रेलवे के कर्मचारियों ने सियालदह में धरना प्रदर्शन किया और तीन घंटे से अधिक समय तक रेलवे सेवाएं बाधित रहीं. पूरा मामले की जांच की उच्च न्यायालय की ओर से जांच गई और एक प्राथमिक रिपोर्ट के आधार पर मलिक को निलंबित कर दिया गया.
जांच पूरी होने पर कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 2013 में दंड स्वरूप मलिक को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी. इस फैसले को मलिक ने उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने चुनौती दी. पीठ ने अनुशासनात्मक समिति के फैसले को बरकरार रखा. तब मलिक ने एक खंडपीठ के समक्ष फैसले को चुनौती दी. खंडपीठ ने निचली अदालत के अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को दरकिनार कर दिया.
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