विदेशों में भी रहता है ‘पोइला बैशाख’ का उत्साह
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :15 Apr 2019 6:14 AM (IST)
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पंडित सुमन घोष प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक बंगाल की संस्कृति में पोइला बैशाख को साल की शुरुआत माना जाता है. पोइला बैशाख बंगालियों का नव वर्ष है. यह बंगाल की सांस्कृतिक वैभवता का प्रतीक है. बंगाल में पोइला बैशाख काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है. यह उत्सव बंगाली या बंगाल में रहनेवाले लोग या […]
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पंडित सुमन घोष
प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक
बंगाल की संस्कृति में पोइला बैशाख को साल की शुरुआत माना जाता है. पोइला बैशाख बंगालियों का नव वर्ष है. यह बंगाल की सांस्कृतिक वैभवता का प्रतीक है. बंगाल में पोइला बैशाख काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है.
यह उत्सव बंगाली या बंगाल में रहनेवाले लोग या विदेशों में रहनेवाले बंगाली मूल के लोग काफी उत्साह से मनाते हैं. देश के हर त्योहार की तरह नये कपड़े पहनना और अच्छा खाना खाने की परंपरा भी पोइला बैशाख से जुड़ी हुई है.
एशो हे बैशाख …ऐशो ऐशो.. जैसे गीत से पोइला बैशाख यानी नववर्ष का आह्वान किया जाता है. अमेरिका के टेक्सास के ह्यूस्टन में रहते हुए मुझे करीब 15-20 वर्ष हो गये हैं, लेकिन बचपन में पोइला बैशाख की स्मृति मन-मस्तिष्क पर आज भी अंकित है.
मेरे पिता जमशेदपुर के टाटा स्टील में कार्यरत थे. इस कारण मेरा बचपन जमेशदपुर में बीता है. फिर कोलकाता, मुंबई और दिल्ली के बाद 2000 से अमेरिका में रह रहा हूं. जमशेदपुर की संस्कृति, कॉस्मोपोलिटन संस्कृति है.
सभी राज्य, जाति और वर्ग के लोग वहां रहते हैं. पोइला बैशाख के दिन लोगों से मिलना. बड़ों को प्रणाम करना. उनका आशीर्वाद लेते थे. मेरी मां जमशेदपुर में रहते हुए स्थानीय लोगों से काफी घुल-मिल गयी थीं. इस कारण मैं जितने उत्साह से पोइला बैशाख मनाता था, उतने ही उत्साह से होली का भी पालन करता था.
वहां की संस्कृति पूरी तरह से भारत की संस्कृति थी. जमशेदपुर में जिस भारतीय संस्कृति की नींव मेरे मन में पड़ी थी. विदेशों में आने के बाद उसकी जड़े और भी मजबूत हुई हैं. यहां कई बांग्ला संस्थाएं हैं, जो पोइला बैशाख मनाती हैं.
उनमें मैं उसी उत्साह से शामिल होता हूं, जितने उत्साह से पंजाबियों के बैशाखी उत्सव में. बांग्ला भाषा बोलने पर गर्व महसूस करता हूं,लेकिन जैसे ही भारत के बाहर निकलता हूं, बंगाल और अन्य राज्यों के बीच का भेद मिट जाता है और हम एक हो जाते हैं.
देश की मिट्टी छोड़ने पर ही भारतीय संस्कृति का आभास और उसकी गरिमा का अंदाज होता है. यह एक बहुत ही गहरी बात है. इतने सारे प्रदेशों को मिलकर भारत बना है. कई संस्कृतियों का समावेश यहां होता है और संस्कृतियों के समन्वय पर ही देश का विकास निर्भर है.
प्रत्येक प्रदेश का अपना रिवाज और अपनी संस्कृति है. अपना खान-पान है, लेकिन यह सोचना कि मैं बंगाली हूं, तो मेरी ही संस्कृति सबसे महान है और अन्य संस्कृति पिछड़ी है तो वह गलत होगा. विदेश आने के बाद अहसास होता कि कुएं का मेंढक बनने से कितनी मुश्किलें पैदा होती हैं. देश के बाहर आने पर आप चाहें किसी भी प्रदेश के हों, हम सभी भारतीय संस्कृति के एंबेसडर बन जाते हैं.
हमारी शिक्षा-दीक्षा का भी प्रभाव मेरे व्यक्तित्व व सोच पर पड़ा है. मैंने कई गुरुओं से शिक्षा ली है. इनमें बंगाल के भी गुरु हैं और परम पूज्यनीय गुरु पंडित जसराज भी हैं, जो हरियाणा से हैं.
गुरु पंडित जसराज बंगाल की संस्कृति का बहुत सम्मान करते थे, वह कहते हैं कि बंगाल की संस्कृति और त्योहार का कोई जवाब नहीं है. जमशेदपुर से अभी भी नाता बना हुआ है.
वहां अभी भी मित्र व शुभचिंतक हैं, जिनसे व्हाट्सऐप व मोबाइल से संपर्क बना हुआ है, जब कोलकाता आता हूं, तो कई शुभचिंतक उनका कार्यक्रम सुनने कोलकाता आ जाते हैं. पिछली बार 2006 में मैं जमशेदपुर गया था. उसके बाद वहां जाना नहीं हुआ.
उस समय मेरी मां का निधन हुआ था. उनकी अस्थियों का विसर्जन करना था, तो बात होने लगी कि अस्थियों का विसर्जन कहां किया जाये. संगम, वाराणसी में अस्थियों का विसर्जन करने की बात सामने आयी. जमशेदपुर में स्वर्ण रेखा और खड़काई नदी का संयोग स्थल है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘दोमुहानी’ कहते हैं.
मेरे पिता ने कहा कि तुम्हारी मां का जमशेदपुर से काफी लगाव था. यदि दोहुमानी में उनकी अस्थियों का विसर्जन करोगे, तो उनकी आत्मा को सुकून और शांति मिलेगी. पिताजी के सुझाव के अनुसार मैंने जमशेदपुर जाकर मां की अस्थियों का विसर्जन दोमुहानी में किया था.
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