इलाज मनोरोग का हुआ, लौट आयी आंखों की रोशनी

Updated at : 23 Feb 2019 1:35 AM (IST)
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इलाज मनोरोग का हुआ, लौट आयी आंखों की रोशनी

कोलकाता : मानसिक बीमारी से आंख की रोशनी चली जायेगी, कौन जानता था! जानना-समझना तो दूर, परिवार का कोई सदस्य इस बारे में सोच भी नहीं रहा था. यहां तक कि आंखों के डॉक्टरों को भी यह अहसास नहीं था. मेटियाबुर्ज (कोलकाता) की सारिका बीबी इसे ही नियति मानकर चार साल से बिना दुनिया देखे […]

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कोलकाता : मानसिक बीमारी से आंख की रोशनी चली जायेगी, कौन जानता था! जानना-समझना तो दूर, परिवार का कोई सदस्य इस बारे में सोच भी नहीं रहा था. यहां तक कि आंखों के डॉक्टरों को भी यह अहसास नहीं था. मेटियाबुर्ज (कोलकाता) की सारिका बीबी इसे ही नियति मानकर चार साल से बिना दुनिया देखे जी रही थीं.

अंत में उन्हें मनोरोग विशेषज्ञ के पास ले जाया गया. छह महीने के इलाज के बाद उनकी आंखों की रोशनी लौटने लगी. इसका साक्षी बना कोलकाता का इंस्टीट्यूट ऑफ सायकायट्री हॉस्पिटल (आइओपी). डॉक्टरों का कहना है कि यह जटिल बीमारी है, लेकिन इसका इलाज असंभव नहीं. बीमारी को अगर सही से डाइग्नोस कर लिया जाये तो बीमारी का इलाज संभव होता है. सबसे बड़ी बीमारी तो सही डाइग्नोस नहीं कर पाने की है. वैसे कुछ करिश्मे भी होते हैं जिंदगी में

क्या हुआ था 4 साल पहले
सारिका के पति नजरूल इस्लाम को आज भी 2015 के वे दिन याद आते हैं तो वह तड़प उठते हैं. फेफड़े के संक्रमण से उनकी दो साल की बेटी उस दिन मरणासन्न पड़ी थी. आधी रात बाद बच्ची के स्वास्थ्य में थोड़ा सुधार हुआ. नजरूल कहते हैं, ‘उसके दूसरे दिन बच्ची की मां सारिका ने कहा कि उन्हें सब धुंधला-धुंधला दिख रहा है. मैंने कहा- कई दिनों से परेशान हो, अच्छी तरह सो नहीं पायी हो, शायद इसीलिए ऐसा हो रहा है. दूसरे दिन जब उसने कहा कि कुछ नहीं देख पा रही हूं, तब मैं उसे आंखों के डॉक्टर के पास ले गया.’ उसके बाद ढाई साल तक सारिका को आंख के कई डॉक्टरों और तंत्रिका (नर्व्स) रोग विशेषज्ञों को दिखाया, लेकिन कोई सुधार नहीं दिखा.
कोलकाता बायपास के पास स्थित कॉरपोरेट हॉस्पिटल से लेकर मुकुंदपुर के प्राइवेट नेत्ररोग हॉस्पिटल में भी दिखाया. आंखों के डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि सारिका पूरी तरह दृष्टिहीन हो चुकी हैं. तंत्रिका रोग विशेषज्ञ ने भी यही कहा. कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था. कभी-कभी सारिका का डिप्रेशन इतना बढ़ जाता कि उसे संभालकर रखना नजरूल के वश से बाहर हो जाता. तब किसी ने उन्हें मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाने की सलाह दी. न तो सारिका और न ही परिवार के किसी सदस्य को यह पता था कि आईओपी के मनोरोग विशेषज्ञ उसकी आंख की रोशनी लौटा देंगे.
समझिए यह हुआ कैसे
छह महीने पहले डिप्रेशन का इलाज शुरू करते समय आईओपी के मनोरोग विशेषज्ञ ने बीमारी के कारण को भांप लिया. अस्पताल के डायरेक्टर डॉक्टर प्रदीप कुमार साहा ने बताया, ‘सारिका की दृष्टिहीनता का कारण आंख और तंत्रिका की समस्या ही नहीं है. यह न्यूरो-सायकायट्रिक समस्या है. यह समझते हमें देर नहीं लगी.
मरीज को भर्ती कर जरूरी मेडिकल टेस्ट कराने की जरूरत थी. यह डिसथैमिया विद डिसोसिएशन विद साइकोजेनिक ब्लाइंडनेस है. यानी मानसिक बीमारी की वजह से आंख की देखने की क्षमता खत्म हो जाना.’ डॉ साहा का कहना है कि मानसिक दबाव और पीड़ा के मिले-जुले प्रभाव से सारिका के मस्तिष्क में कुछ ऐसा न्यूरोकेमिकल बन रहा था, जिससे उसे धुंधला दिखाई पड़ने लगा. धीरे-धीरे उनकी आंखों की रोशनी चली गयी.
किस प्रकार मनोविकृति के कारण सारिका की आंखों की रोशनी चली गयी थी? नेत्ररोग विशेषज्ञ ज्योतिर्मय दत्त के मुताबिक, आंखों से मस्तिष्क को जोड़ने वाली नर्व है, ऑप्टिक नर्व. स्नायु तंतु के माध्यम से आंखों से उस तस्वीर का विकिरण मस्तिष्क के अंदर (ब्रेन एरिया-16) पहुंचता है. कभी मानसिक आघात या डिप्रेशन में ऑप्टिक नर्व्स का सिग्नल पूरी तरह मस्तिष्क के 16 नंबर एरिया में नहीं पहुंच पाता. इस कारण अंधेपन की स्थिति पैदा होती है. सारिका के साथ भी लगभग ऐसा ही हुआ. डॉ दत्ता कहते हैं कि दस लाख में से कोई एक मरीज इन परिस्थितियों में अंधा हो सकता है.
मनोरोग विशेषज्ञ जयरंजन राम ने बताया- ‘यह बिल्कुल नयी तरह की घटना है. मेडिकल साइंस की किताबों में इस बीमारी के बारे में पढ़ा है, परंतु इस तरह के मरीज को कभी देखा नहीं.’ लगभग डेढ़ साल से सारिका का नियमित इलाज चल रहा है. उन्होंने अपनी दूसरी संतान को जन्म भी दिया है. दवाई से बेचैनी और डिप्रेशन से उबर गयी हैं. डॉक्टर ने आश्वासन दिया है कि दवा लेते रहने से अब उनकी आंखों की रोशनी नहीं जाएगी. यह सुनकर सारिका फफक पड़ीं और कहने लगीं, ‘इतने दिनों से अपने बच्चों को नहीं देख पायी, आपकी कृपा से उन्हें देख पाऊंगी.’
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