भवन निर्माण में भूकंपरोधी मापदंडों को मानना जरूरी

Updated at : 13 Sep 2018 6:17 AM (IST)
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भवन निर्माण में भूकंपरोधी मापदंडों को मानना जरूरी

कोलकाता : मकानों व आलीशान कंप्लेक्स के निर्माण में भूकंपरोधी मानकों को मानना जरूरी है, तभी भूकंप से होनेवाली क्षति से बचा जा सकता है. ये बातें अहमदाबाद में स्थित भारत के पहले डिजाइन यूनिवर्सिटी अनंत नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अमित सेठ ने यहां प्रभात खबर से बातचीत करते हुए कहीं. उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी […]

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कोलकाता : मकानों व आलीशान कंप्लेक्स के निर्माण में भूकंपरोधी मानकों को मानना जरूरी है, तभी भूकंप से होनेवाली क्षति से बचा जा सकता है. ये बातें अहमदाबाद में स्थित भारत के पहले डिजाइन यूनिवर्सिटी अनंत नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अमित सेठ ने यहां प्रभात खबर से बातचीत करते हुए कहीं. उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी द्वारा वास्तुकला व डिजाइनिंग की इंजीनियरिंग की डिग्री के दौरान छात्रों को सिस्मिक प्रभाव व भूकंपरोधी पहलुओं को भी सिखाया जाता है. स्थान के अनुसार निर्माण में उन पहलुओं को ध्यान में रखने की सीख दी जाती है. उल्लेखनीय है कि पिछले 15 दिनों में पश्चिम बंगाल में भूकंप के दो झटके आये हैं.

हाल में प्रकाशित एक सर्वेक्षण के अनसार देश के 38 शहरों के मकान भूकंप झेलने लायक नहीं हैं. इनमें कोलकाता भी शामिल है. मुंबई, कोलकाता और चेन्नई भूकंप जोन-3 में स्थित हैं, यहां काफी भारी भूकंप आ सकते हैं. प्रोफेसर सेठ बताते हैं कि मकान बनाने में भूकंप रोधी मापदंडों का माना जाना जरूरी है तथा मकान के प्लान मंजूरी के दौरान इसका ध्यान रखा जाना चाहिए. वहीं, सूत्रों का कहना है कि भारतीय मानक ब्यूरो ने 1962 में पहली बार ‘भूकंप रोधी डिजाइन के लिए भारतीय मानक शर्त’ का प्रकाशन किया था, जिसमें ताजा संशोधन 2005 में किया गया है. इसकी सिफारिश के मुताबिक देश के कम ही मकान बने हुए हैं. ये मानक बाध्यकारी नहीं हैं. इसलिए किसी को पता नहीं है कि भूकंपरोधी आवासीय मकान बनाने के लिए कोई दिशा-निर्देश है.
परियोजना के निर्माण में नहीं ली जाती है डिजाइनिंग विशेषज्ञ की मदद :
प्रोफेसर सेठ बताते हैं कि नीदरलैंड ही एकमात्र देश है, जहां बस स्टैंड बनाने में भी डिजाइनिंग विशेषज्ञ की मदद ली जाती है. अन्य किसी देश में अभी तक परियोजना के निर्माण के समय डिजाइनिंग विशेषज्ञ की मदद नहीं ली जाती है. उन्होंने कहा कि पूरे देश में मेट्रो का जाल बिछ रहा है. कोलकाता में भी मेट्रो का निर्माण दो दशक पहले से हो गया है, लेकिन क्या मेट्रो के निर्माण के समय मेट्रो पर जनसंख्या के बढ़ते दवाब का ध्यान रखा गया था. अगर यह ध्यान में रखा जाता है, तो मेट्रो की यह स्थिति नहीं होती. पूरे विश्व में केवल लंदन मेट्रो ही ब्रेक इवेन के हालात में हैं. उन्होंने कहा कि रेलवे को छोड़ कर देश की शायद ही किसी परियोजना में डिजाइनिंग विशेषज्ञ को शामिल किया जाता है. केवल आर्किटेक्चर विशेषज्ञ की राय से ही परियोजनाएं क्रियान्वित कर दी जाती हैं.
इंट्रैक्शन डिजाइनिंग की मांग अधिक : अनंत नेशनल यूनिवर्सिटी के एक्सट्रनल इंगेजमेंट की एसोसिएट डीन निधि गोयल का कहना है कि अब डिजाइनिंग के साथ-साथ इनोवेशन पर भी जोर दिया जाता है. डिजाइनिंग केवल उत्पादों की नहीं हो, बल्कि नीति निर्धारण में भी डिजाइनिंग को शामिल किया जाये. वर्तमान में इनट्रैक्शन डिजाइनिंग की मांग बहुत ही अधिक है. इसके तहत सूचना-प्रौद्योगिकी की मदद से डिजाइनिंग की जाती है.
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