मीडिया को नहीं, कट्टरपंथियों को रोकें
Updated at : 06 Jul 2017 4:09 PM (IST)
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!!सत्यप्रकाश चौधरी !! एक फेसबुक पोस्ट से सांप्रदायिक दंगों की आग में जले उत्तर 24 परगना के बादुड़िया में जनजीवन अब दो दिन बाद पटरी पर लौट रहा है. लेकिन इस मामले में भी वही सवाल मुंह बाये खड़े हैं जो मालदा के कालियाचक, उत्तर दिनाजपुर के चोपड़ा, हावड़ा के धूलागढ़ में खड़े हुए थे. […]
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!!सत्यप्रकाश चौधरी !!
एक फेसबुक पोस्ट से सांप्रदायिक दंगों की आग में जले उत्तर 24 परगना के बादुड़िया में जनजीवन अब दो दिन बाद पटरी पर लौट रहा है. लेकिन इस मामले में भी वही सवाल मुंह बाये खड़े हैं जो मालदा के कालियाचक, उत्तर दिनाजपुर के चोपड़ा, हावड़ा के धूलागढ़ में खड़े हुए थे. इन घटनाओं की राष्ट्रीय मीडिया में जोरदार गूंज सुनी गयी, पर बंगाल के मीडिया से ये घटनाएं गायब सी रहीं. आखिर वो कौन सी ताकतें हैं जो बंगाल के मीडिया में इन घटनाओं का पूरा कवरेज नहीं होने देतीं. बादुड़िया में क्या हुआ, उससे ज्यादा स्थानीय मीडिया में राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच विवाद चर्चा का विषय बना हुआ है.
यूं तो बंगाल में मीडिया जीवंत है, लेकिन सांप्रदायिक घटनाओं के मामले में उसे सांप सूंघ जाता है. इसके पीछे राज्य सरकार की जबान बंद कराने की नीति है. बीते साल दिसंबर में जब हावड़ा के धूलागढ़ में दंगे हुए, तो कुछ मीडिया समूहों के हिंदी चैनलों में तो यह खबर खूब दिखायी गयी, लेकिन उनके बांग्ला चैनलों में यह खबर गायब दिखी. इसके लिए ममता सरकार ने उन हिंदी चैनलों पर मुकदमा भी कर दिया. सांप्रदायिक दंगे वाले क्षेत्रों में इंटरनेट बंद कर देना और मीडिया के प्रवेश पर रोक लगा देना ममता सरकार का स्थायी तौर-तरीका बन चुका है. सरकार कट्टरपंथी ताकतों से निपटने की जगह मीडिया की जबान बंद कराने में अपनी ताकत लगाती है.
यह सही है कि इस तरह की घटनाओं से भाजपा लाभ उठाने की कोशिश करती है, पर इस तर्क के आधार मीडिया की आजादी को कुचलने को जायज नहीं ठहराया जा सकता. बंगाल में इन दिनों सांप्रदायिक धुव्रीकरण की कोशिशें तेज हैं. इसके जरिये भाजपा दिन-ब-दिन राज्य में अपना आधार मजबूत कर रही है. तृणमूल को भी यह एहसास है कि आगामी पंचायत चुनाव में उसे सीपीएम या कांग्रेस की जगह भाजपा से चुनौती मिलने वाली हैं. अगर तृणमूल को भाजपा से निपटना है, तो वह मीडिया की जबान बंद करके उसे नहीं निपट सकती है. इसकी जगह उसे निष्पक्ष दिखना होगा. कट्टरपंथी चाहे किसी संप्रदाय के हों, उनसे सख्ती से निपटना होगा. अगर एक संप्रदाय के कट्टरपंथियों पर सरकार नरम दिखेगी, तो दूसरे संप्रदाय के कट्टरपंथियों को सहज ही अपनी जमीन तैयार करने का मौका मिलेगा.
किसी तरह की अशांति की स्थिति में इंटरनेट को बंद करना कितना कारगर है, इस पर भी सरकार को विचार करना होगा. गोरखालैंड आंदोलन को लेकर पहाड़ बीते 20-22 दिनों से उबल रहा है. लगभग इतने ही दिनों से पहाड़ पर इंटरनेट बंद कर दिया गया है. सरकार ने एक आदेश जारी करके पहाड़ पर इंटरनेट पर रोक को आगामी 14 जुलाई तक बढ़ा दिया है. सरकार का तर्क है कि इंटरनेट के जरिये आंदोलनकारी गोलबंद होते हैं और अफवाहें भी फैलती हैं. लेकिन हकीकत यह है कि इंटरनेट बंद होने के बावजूद आंदोलनकारी लगातार गोलबंद होकर आंदोलन में उतर रहे हैं. ऐसे में ममता सरकार को अपनी मीडिया नीति पर नये सिरे से सोचना चाहिए.
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