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आसनसोल : स्थानीय पोलो ग्राउंड में लगा दस दिवसीय पुस्तक मेला अब अपने समापन की ओर है. आगामी 22 जनवरी को इसका समापन होगा. लेकिन तमाम उपलब्धियों के बावजूद यह मेला हिंदी भाषा तथा संस्कृति के मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुआ है. हालांकि इसके लिए मेले के आयोजक कम, हिंदी के नाम पर […]

आसनसोल : स्थानीय पोलो ग्राउंड में लगा दस दिवसीय पुस्तक मेला अब अपने समापन की ओर है. आगामी 22 जनवरी को इसका समापन होगा. लेकिन तमाम उपलब्धियों के बावजूद यह मेला हिंदी भाषा तथा संस्कृति के मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुआ है. हालांकि इसके लिए मेले के आयोजक कम, हिंदी के नाम पर दुकान चला रहे तथाकथित हिंदी के मसीहा तथा नगर निगम प्रशासन के खर्चे पर साहित्य के नाम पर उलगुलान करनेवाले हिंदी साहित्य के क्रांतिकारी हस्ताक्षर अधिक जिम्मेवार हैं. बिडम्बना यह रही कि मेयर जितेन्द्र तिवारी ने इस मेले की सफलता के लिए काफी प्रयास किया लेकिन नगर निगम से जुड़ी हिंदी अकादमी भी कोई पहल नहीं कर सकी. आसनसोल पुस्तक मेले के आयोजन का यह 36 वां साल है. पूरे राज्य में कोलकाता पुस्तक मेले के बाद इसका दूसरा स्थान है.
दशकों से इस मेले में हिंदी भाषा तथा हिंदी से जुड़े साहित्य की उपेक्षा का आरोप लगता रहा है. आयोजकों की मानसिकता भले ही बदलती रही हो, लेकिन इस उपेक्षा में कोई बदलाव नहीं आया है. आयोजकों का तर्क होता है कि वे हिंदी पुस्तकों के प्रकाशकों को स्टॉल लगाने का प्रस्ताव देते हैं, लेकिन वे यह कह कर स्टॉल लगाने से इंकार कर देते हैं कि मेले में हिंदी की पुस्तकें नहीं बिकती है तथा उन्हें घाटा होता है. यही कारण है कि हिंदी की पुस्तकें मेले में अधिक संख्या में उपलब्ध नहीं हो पाती है. हिंदी पुस्तकों के नाम पर शहर की दो पुस्तक विक्रे ता दुकानें ही अपना स्टॉल लगाती हैं, जिनमें अन्य भाषाओं की भी पुस्तकें रहती है. हिंदी के नाम पर दर्जन भर पुराने व नये लेखकों की पुस्तकें रहती हैं.
सांस्कृतिक मोर्चे पर हुई उपेक्षा
सांस्कृतिक मोर्चे पर भी यही उपेक्षा दिखती है. हिंदी पुस्तकों के स्टॉल नहीं होने के नाम पर हिंदी के साहित्यकार भी मेले में कम ही आते-जाते हैं. इस कारण आयोजकों के स्तर से होनेवाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिंदी गायब रहती है. इस वर्ष भी 13 जनवरी से शुरू हुए मेले में एक दिन भी हिंदी में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हुआ. जो भी हुए या होंगे, सभी बांग्ला भाषा में थे और होंगे. यह स्थिति तब है जब नगर निगम के पास सक्रिय हिंदी अकादमी है तथा हिंदी अकादमी तथा नगर निगम के खर्चे व संसाधन पर तथाकथित साहित्यिक जनजागरण तथा क्रांति करनेवाले साहित्यकारों की पूरी जमात मौजूद है. हिंदी अकादमी की सचिव उर्मा सर्राफ कहीं से भी खुद को साहित्यिक नहीं मानती है. हिंदी अकादमी का अपना कोई सक्रिय तंत्र नहीं है. सदस्यता के नाम पर दर्जनों की संख्या में लोग शामिल किये गये हैं लेकिन सक्रियता के नाम पर चुनिंदा लोग ही दिखते हैं.
िदग्गजों ने नहीं िदखायी दिलचस्पी
बिडम्बना यह है कि पुस्तक मेले में हिंदी साहित्य को ले जाने या मेले में साहित्यिक कार्यक्रम करने में उन लोगों ने भी दिलचस्पी नहीं दिखायी, जो नवजागरण का मशाल जलाने का दावा करते हुए ‘मैं तुम्हें सुनाऊ, तू मुङो सुनाओ अपनी प्रेम कहानी’ की तर्ज पर हिंदी साहित्य को कोयलांचल में बुलंदियों पर ले जा रहे हैं. नगर निगम की बैसाखी पर उलगुलान के शंख फूंके जा रहे हैं.
हालांकि मेयर श्री तिवारी ने हिंदी अकादमी के एक कार्यक्रम में उनकी सक्रियता पर माकूल टिप्पणी की थी. उनका कहना था कि खुद को साहित्यकार कहनेवालों का जनता के साथ न तो कोई संबंध है और न व जनता की समस्याओं व मानसिकता को समझ पा रहे है. मेले में हिंदी अकादमी की निष्क्रियता से संबंधित मुद्दे पर उन्होंने कहा कि उनके पास इस तरह का कोई सुझाव नहीं आया. यदि आता तो वे निश्चित रूप से इसकी पहल करते. उन्होंने आश्वासन दिया कि अगले वर्ष इसकी कमी नहीं होगी.
आयोजनों का उपयोग िहंदी के िवकास के िलए होने पर बढ़ेगा हिंदी का प्रभाव
वैसे इस समय फेसबुक पर भी हिंदी को लेकर कोयलांचल में क्रांति चल रही है. लेकिन इन क्रांतिकारियों की कोई सक्रियता इस मेले में नहीं दिखना उन हिंदी प्रेमियों के लिए दु:खद था जो सही मायने में हिंदी की पीड़ा को समझने की कोशिश कर रहे हैं या हिंदी भाषियों की समस्याओं से जूझ रहे हैं. अगर ऐसे आयोजनों का उपयोग हिंदी के विकास के लिए हो तो शायद हिंदी का प्रभाव बढ़े तथा रिक्शाचालक से लेकर कोयला श्रमिकों तक एवं मोटिया मजदूर से लेकर खोमचावाले तक के बच्चे हिंदी यानी अपनी मातृभाषा में कम से कम साक्षर होने का तो मौका पा जाये.
Prabhat Khabar Digital Desk
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