29 दिन नहीं होंगे मांगलिक कार्य

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16 दिसंबर से शुरू होगा खरमास, अगले वर्ष 14 जनवरी को होगा समाप्त 14 जनवरी को मनेगा मकर संक्रांति का पर्व दुर्गापुर : प्रत्येक वर्ष में दो बार खरमास लगता है. इस वर्ष 16 दिसंबर से खरमास शुरू होगा और 14 जनवरी को समाप्त होगा. गुरु की मीन राशि एवं धनु राशि में जाकर सूर्य […]

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16 दिसंबर से शुरू होगा खरमास, अगले वर्ष 14 जनवरी को होगा समाप्त
14 जनवरी को मनेगा मकर संक्रांति का पर्व
दुर्गापुर : प्रत्येक वर्ष में दो बार खरमास लगता है. इस वर्ष 16 दिसंबर से खरमास शुरू होगा और 14 जनवरी को समाप्त होगा. गुरु की मीन राशि एवं धनु राशि में जाकर सूर्य प्रवेश करता है तथा खरमास का प्रारंभ होता है. सूर्य उपरोक्त राशियों से निकल कर अगली रािश में प्रवेश करता है तो खरमास समाप्त हो जाता है.
पंडित भारत तिवारी के अनुसार इस वर्ष गुरुवार दिनांक 15 दिसंबर को रात्रि शेष 6:00 बजे अर्थात् दिनांक 16 दिसंबर को सूर्योदय से पूर्व भोर में 6:00 बजे सूर्य धनु राशि में प्रवेश कर रहे हैं. इसके बाद खरमास प्रारंभ हो जायेगा. इस बार खरमास मात्र 29 दिन का ही होगा. पुन: सूर्य के धनु से निकल कर मकर राशि में प्रवेश करने के साथ खरमास समाप्त हो जाएगा. सूर्य धनु से मकर राशि में 14 जनवरी 2017 शनिवार को अपराह्न 1:48 बजे प्रवेश करेंगे. अत: मकर संक्रांति या तिल संक्रांति का पावन पर्व 14 जनवरी 2017 शनिवार को मनाया जायेगा. खरमास, यानि खरा महीना.
वो महीना जब हर प्रकार के शुभ काम बंद हो जाते हैं. कोई नया काम शुरू नहीं किया जाता है. इस मास के साथ आती है कई प्रकार की बंंदिशें और साथ ही ये साह भी कि जरा बच कर रहियेगा, जरा सोच समझकर काम कीजिएगा. पौष मास (खरमास) शुरू हो रहा है. यह 16 जनवरी तक रहेगा. पौष मास का शास्त्रों में अत्यधिक महत्व बताया गया है. सूर्य प्रतिकूल हो तो हर कार्य में असफलता नजर आती है. भारतीय पंचांग पद्धति में प्रतिवर्ष पौष मास को खरमास कहते हैं. इसे मामास का महीना भी कहा जाता है.
खरमास में सभी प्रकार के हवन, विवाह चर्चा, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, द्विरागमन, यज्ञोपवित, विवाह या अन्य हवन कर्मकांड आदि तक का निषेध है. खरमास के बारे में एक पौराणकि किंवदंती है कि खर गधे को कहते हैं. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार सूर्यदेव अपने घोड़ों के राथ में बैठकर ब्रहमांड की परिक्रमा करते हैं और परिक्रमा के दौरान कहीं भी सूर्य को एक क्षण भी रुकने की इजाजत नहीं है. लेकिन सूर्य के सातों घोड़े सालभर दौड़ लगाते-लगाते प्यास से तड़पने लगते हैं. उनकी इस दयनीय स्थिति से निपटने के लिये सूर्य एकता के निकट अपने सातों घोडों को पानी पीने के िलये रुकते हैं. लेकिन तभी उन्हें यह प्रतिज्ञा याद आई कि घोड़े बेशक प्यासे रह जायें, लेिकन यात्रा को विराम नहीं देना है.
नहीं तो सौरमंडल में अनर्थ हो जायेगा. ऐसे में सूर्य भगवान ने चारों ओर देखा और पानी के कुंड के आगे खड़े दो गधों को अपने रथ पर जोड़कर आगे बढ़ गये और घोड़ों को प्यास बुझाने के लिये खोल दिया गया. स्थिति यह रही कि गधे यानी खर अपनी मंद गति से पूरे पौष मास में ब्रह्मांड की यात्रा करते रहे और सूर्य का तेज बहुत ही कमजोर होकर धरती पर प्रकट हुआ. यही कारण है कि पूरे पौष मास पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य देवता का प्रभाव क्षीण हो जाता है और कभी-कभार ही उनकी तप्त किरणें धरती पर पड़ती है.
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