अमेरिकी युवा बने स्कूलों में शिक्षक

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कोलकाता: अमेरिका और भारत के बीच सांस्कृतिक दूतों के रूप में अमेरिका के पांच युवाओं का एक समूह महानगर के विभिन्न स्कूलों में नौ माह की अवधि के लिए पढ़ा रहा है. अमेरिकी सरकार के शैक्षणिक और सांस्कृतिक मामलों के ब्यूरो द्वारा संचालित फुलब्राइट-नेहरु इंग्लिश टीचिंग असिस्टेंटशिप प्रोग्राम के तहत यह अमेरिकी युवक, मिडिल और […]

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कोलकाता: अमेरिका और भारत के बीच सांस्कृतिक दूतों के रूप में अमेरिका के पांच युवाओं का एक समूह महानगर के विभिन्न स्कूलों में नौ माह की अवधि के लिए पढ़ा रहा है. अमेरिकी सरकार के शैक्षणिक और सांस्कृतिक मामलों के ब्यूरो द्वारा संचालित फुलब्राइट-नेहरु इंग्लिश टीचिंग असिस्टेंटशिप प्रोग्राम के तहत यह अमेरिकी युवक, मिडिल और हाईस्कूल के विद्यार्थियों को बोलचाल की अंग्रेजी और मूल्य-आधारित शिक्षा की पढ़ाई करवा रहे हैं. इनमें से एक एडिजा एफुओ एघन ने बताया कि यहां कक्षा का माहौल बहुत अलग है.

अमेरिका में कक्षा में बैठे विद्यार्थी शौचालय जाने के लिए या पानी पीने के लिए अनुमति नहीं लेते है, लेकिन यहां विद्यार्थी बेहद अनुशासित हैं और शिक्षक को बहुत आदर देते हैं. हम यहां एक विशेष हस्ती की तरह महसूस करते हैं. बोस्टन कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर चुकीं एडिजा पिछले कुछ माह से बालीगंज शिक्षा सदन स्कूल में पढ़ा रही हैं.

भारतीय स्कूलों के लिहाज से नयी शैक्षणिक तकनीकों के साथ प्रयोग करते हुए ये अमेरिकी युवा अंग्रेजी भाषा में निर्देश देने से लेकर वाक्य रचना तक की प्रक्रिया में यहां के शिक्षकों की मदद कर रहे हैं. मूल रुप से अंग्रेजी बोलने वाले होने के नाते वे सांस्कृतिक ज्ञान भी उपलब्ध करवा रहे हैं. यहां मजेदार बात यह है कि इनमें से ज्यादातर युवा कहते हैं कि वे शिक्षक बनना नहीं चाहते हैं, लेकिन छोटी सी अवधि के लिए इस शिक्षण कार्य को इसलिए उन्होंने चुना है क्योंकि वे भारत का अनुभव लेना चाहते थे. वह एक ऐसे देश में रहना चाहते थे जो अमेरिका से सांस्कृतिक और भौगोलिक लिहाज से भिन्न है. सेंट जांस डायोसियन गल्र्स हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ाने वाली क्रिस्टीन जेड पार्डी कहती हैं कि मैं भारत में आने और यहां रहने का अवसर चाहती थी क्योंकि यह विभिन्नताओं से भरा देश है.

अंग्रेजी और सिनेमा में बिंघमटन विश्वविद्यालय से स्नातक कर चुकीं क्रिस्टीन कहती हैं कि उन्हें ऐसा लगता है कि मानों वह स्कूल के अध्यापकों और विद्यार्थियों के एक नए परिवार का हिस्सा हैं. स्कूल के दूसरे अध्यापकों के लिए भी यह एक सीखने योग्य अनुभव था. उन्होंने खेल, वीडियो और दूसरे रचनात्मक माध्यमों से बच्चों को पढ़ाने के तरीके सीखे. डोल्ना डे स्कूल की प्राचार्य मदुरा भट्टाचार्य का मानना है कि यह प्रयास सभी बाधाओं को तोड़ रहा है क्योंकि सांस्कृतिक आदान-प्रदान से स्कूल में अध्ययन-अध्यापन के नए तरीके लाने में मदद मिल रही है. श्रीमती भट्टाचार्य ने कहा कि वह हमारे साथ अच्छी तरह घुलमिल गये.

इनसे काफी नयी चीजें सीखने को मिली. स्कूल प्रबंधन ने नये शिक्षकों को छात्रों की कक्षायें लेने और उन्हें पढ़ाने के लिए पूरी आजादी दी है. रशेल मैरी ग्लोगोवस्क कहती हैं कि उन्होंने बच्चों को इतिहास में अमेरिकी हस्तियों के बारे में शिक्षित करने के लिए पारंपरिक अमेरिकी कहानी शैली का प्रयोग किया है. एडिजा ने कहा कि उन्होंने अपनी कक्षाओं के दौरान भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा का ज्वलंत मुद्दा उठाया. मैंने उनके साथ महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर अखबारों में आ रही खबरों के बारे में पूछा. भारत में कक्षाओं के बड़े आकार इन अमेरिकी युवाओं के लिए एक चुनौती थे. वह कहते हैं कि 50-60 बच्चों के एक बैच में हर विद्यार्थी पर ध्यान देना बहुत मुश्किल है. अमेरिका में कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या कम होती है. क्रिस्टीन का कहना है कि वह अपना अध्यापन कार्य इस माह के आखिर तक पूरा होने के बाद भारत में एक और साल रहना चाहती हैं तथा गैर सरकारी संगठनों के साथ काम करना चाहती हैं. उनका यह काम इस माह के अंत में पूरा हो जाएगा.

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