सावन में यूपी की इन 5 परंपराओं का इतिहास है बेहद दिलचस्प, कहीं नागकूप तो कहीं गूंजती है कजरी
सावन में यूपी की अनोखी लोकपरंपराओं की झलक (AI)
Sawan Traditions in Uttar Pradesh: सावन माह उत्तर प्रदेश को भक्तिमय और सांस्कृतिक रंग में रंग देता है. काशी के नागकूप से लेकर मिर्जापुर की कजरी तक, ये परंपराएं सदियों पुराने इतिहास को समेटे हुए हैं.
Sawan Traditions in Uttar Pradesh: सावन आते ही उत्तर प्रदेश की गलियां भगवान शिव की भक्ति से सराबोर हो जाती हैं. कहीं कांवड़ियों की भीड़ नजर आती है तो कहीं मंदिरों में झूलनोत्सव और लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है. लेकिन यूपी का सावन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है. प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में इससे जुड़ी ऐसी लोकपरंपराएं और मान्यताएं हैं, जिनके पीछे सदियों पुराना सांस्कृतिक इतिहास छिपा है. काशी के नागकूप से लेकर अयोध्या के सावन झूला मेले और मिर्जापुर की कजरी तक, इन परंपराओं में इतिहास, लोकविश्वास, संगीत और धार्मिक आस्था का अनोखा मेल देखने को मिलता है.
काशी का नागकूप: पतंजलि की तपस्थली से जुड़ी है मान्यता

वाराणसी के जैतपुरा क्षेत्र में स्थित नागकूप सावन, खासकर नाग पंचमी के दौरान श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनता है. स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में इसे महर्षि पतंजलि की तपस्थली से जोड़ा जाता है. नाग पंचमी के दिन यहां विशेष पूजा-अर्चना और मेला आयोजित होता है.
शास्त्रार्थ और नागलोक से जुड़ी मान्यताएं
पुराने समय से यहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ शास्त्रार्थ की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है. नागकूप को लेकर कई लोककथाएं भी प्रचलित हैं. कुछ मान्यताओं में इसे नागलोक से जोड़कर देखा जाता है. वहीं, नाग पंचमी पर यहां नाग देवता की पूजा कर लोग सर्पदोष और नाग देवता की कृपा से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनुष्ठान करते हैं.
काशी की अघोर परंपरा: श्मशान साधना से जुड़ा है गहरा इतिहास

काशी की पहचान केवल मंदिरों और घाटों से नहीं, बल्कि उसकी साधु-संन्यासी परंपराओं से भी है. इनमें अघोर परंपरा का विशेष स्थान है. इस परंपरा का संबंध भगवान शिव के अघोर स्वरूप से जोड़ा जाता है. काशी में बाबा कीनाराम का नाम अघोर परंपरा के प्रमुख संतों में लिया जाता है और उनके जीवनकाल को आम तौर पर 17वीं शताब्दी से जोड़ा जाता है. मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र जैसे श्मशान घाटों से जुड़ी साधना ने अघोर परंपरा को आम लोगों के बीच रहस्यमय स्वरूप दिया है. अघोर साधना में श्मशान और भस्म का धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व माना जाता है.
ब्रज का झूलनोत्सव: सावन में झूलों पर विराजते हैं राधा-कृष्ण

सावन आते ही मथुरा-वृंदावन का माहौल भी बदल जाता है. ब्रज क्षेत्र में झूलनोत्सव की परंपरा के दौरान मंदिरों में राधा-कृष्ण के विग्रहों को आकर्षक झूलों पर विराजमान कराया जाता है. बारिश और हरियाली के मौसम में मनाया जाने वाला यह उत्सव ब्रज की कृष्ण भक्ति और लोकसंस्कृति से गहराई से जुड़ा है. झूलन परंपरा को कृष्ण की ब्रज लीलाओं से जोड़कर देखा जाता है.
संत स्वामी हरिदास का महत्वपूर्ण स्थान
वृंदावन के इतिहास में 16वीं शताब्दी के संत स्वामी हरिदास का महत्वपूर्ण स्थान है. वे ब्रज भक्ति और संगीत परंपरा के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं. सावन में ब्रज के मंदिरों में झूला सजाने, भजन और झूला गीत गाने की परंपरा आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है. इस दौरान पूरा ब्रज क्षेत्र भक्ति और लोकसंगीत के रंग में रंगा नजर आता है.
मिर्जापुर की कजरी: कांतित नरेश की बेटी कजली की लोककथा से जुड़ी परंपरा

सावन और कजरी का रिश्ता पूर्वांचल की लोकसंस्कृति में बेहद खास है. मिर्जापुर को कजरी की प्रमुख परंपराओं के लिए जाना जाता है. यहां कजरी केवल बारिश के मौसम में गाया जाने वाला गीत नहीं, बल्कि लोकस्मृति और विरह की भावनाओं को व्यक्त करने वाली लोकगायन परंपरा भी है. मिर्जापुर जिला प्रशासन के अनुसार, कजरी महोत्सव कांतित नरेश की बेटी कजली की स्मृति से जुड़ी लोककथा को समर्पित है.
कजरी में प्रेम और विरह की गूंज
स्थानीय मान्यता के मुताबिक कजली अपने पति से बिछड़ने के बाद उनकी याद में विरह गीत गाती थीं. उनकी मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में कजरी की परंपरा को याद किया जाने लगा. समय के साथ कजरी ने लोकजीवन से निकलकर मंच और शास्त्रीय संगीत की दुनिया में भी अपनी जगह बनाई. सावन की बारिश, काले बादल, प्रेम और विरह जैसे भाव कजरी के गीतों की प्रमुख विशेषताएं हैं. यही वजह है कि आज भी पूर्वांचल में सावन आते ही कजरी की धुन सुनाई देने लगती है.
अयोध्या का सावन झूला मेला: मणि पर्वत से जुड़ी है सदियों पुरानी परंपरा

अयोध्या में सावन का झूला मेला धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से खास महत्व रखता है. उत्तर प्रदेश सरकार के अयोध्या जिला प्रशासन के अनुसार, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया से इस मेले की शुरुआत होती है. इस दौरान अयोध्या के विभिन्न मंदिरों से भगवान के विग्रह शोभायात्रा के रूप में मणि पर्वत ले जाए जाते हैं, जहां झूलनोत्सव आयोजित किया जाता है.
रामायण से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं
मणि पर्वत पर आयोजित झूलनोत्सव के बाद विग्रहों को वापस मंदिरों में ले जाया जाता है और श्रावण मास के अंतिम दिन तक अलग-अलग मंदिरों में झूलनोत्सव जारी रहता है. सावन पूर्णिमा के साथ मेले का समापन होता है. मणि पर्वत को लेकर रामायण से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं. इनमें एक मान्यता इसे संजीवनी पर्वत से जोड़ती है, आज भी सावन के दौरान अयोध्या में झूला उत्सव श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण बना हुआ है.
इतिहास और लोकविश्वास का संगम है यूपी का सावन
उत्तर प्रदेश का सावन इसलिए खास है क्योंकि यहां धार्मिक आस्था के साथ लोकगीत, संगीत, मेले और सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराएं भी जीवित हैं. काशी का नागकूप, अघोर साधना की परंपरा, ब्रज का झूलनोत्सव, मिर्जापुर की कजरी और अयोध्या का सावन झूला मेला-इन सभी की अपनी अलग-अलग पहचान है.
Also Read: छात्रों पर लाठीचार्ज को अवधेश प्रसाद ने बताया तानाशाही, बोले- सरकार को चुकानी होगी भारी कीमत
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में
By खुशबू कुमारी
खुशबू कुमारी पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर में डिजिटल कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्होंने पटना विमेंस कॉलेज, से मास कम्युनिकेशन में स्नातक किया है तथा वर्तमान में इग्नू से मास्टर ऑफ आर्ट्स (मास कम्युनिकेशन एंड डिजिटल मीडिया) की पढ़ाई कर रही हैं. उन्हें जनहित से जुड़ी खबरों, डिजिटल पत्रकारिता, समाचार लेखन, फोटोग्राफी, वीडियो एडिटिंग और ग्राफिक डिजाइन में विशेष रुचि है. वे राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, अपराध और जनसरोकार से जुड़े विषयों पर शोधपरक, तथ्यपरक और पाठकों के लिए उपयोगी डिजिटल कंटेंट तैयार करती हैं. उनका उद्देश्य पाठकों तक विश्वसनीय, स्पष्ट और प्रभावी जानकारी पहुंचाना है, ताकि समाचार केवल सूचना का माध्यम न होकर समाज के लिए उपयोगी साबित हों.
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










