यूपी : कैराना में भी दिखेगा भाजपा की कर्नाटक जीत का असर, वोटों के धुव्रीकरण होने की संभावना

हरीश तिवारी लखनऊ: कर्नाटक में भाजपा को मिली जीत का असर कैराना में होने वाले लोकसभा उपचुनाव में भी देखने को मिलेगा. इस जीत से भाजपा कार्यकर्ताओं में जोश तो बढ़ेगा ही साथ ही वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा पार्टी को मिलेगा. कैराना में 28 मई को चुनाव होना है. इस सीट पर भाजपा की […]
हरीश तिवारी
लखनऊ: कर्नाटक में भाजपा को मिली जीत का असर कैराना में होने वाले लोकसभा उपचुनाव में भी देखने को मिलेगा. इस जीत से भाजपा कार्यकर्ताओं में जोश तो बढ़ेगा ही साथ ही वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा पार्टी को मिलेगा. कैराना में 28 मई को चुनाव होना है. इस सीट पर भाजपा की मृगांका सिंह और रालोद की तबस्सुम हसन मुख्य प्रतिद्वंदी है. जबकि बसपा ने खुले तौर पर किसी का समर्थन नहीं किया है.
कर्नाटक में हुए चुनाव के परिणाम आने के बाद राज्य भाजपा के नेता काफी खुश हैं. वहां पर पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है और सरकार बनाने में महज आठ सीटों से दूर है. अभी तक सब की निगाह कर्नाटक के परिणामों पर थी. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में मिली हार के लिए कार्यकर्ता की नाराजगी बड़ी वजह मानी गयी थी. लिहाजा भाजपा संगठन कैराना के लिए कार्यकर्ताओं में जोश भर रहा था. लेकिन, कर्नाटक की जीत के बाद पार्टी मान रही है कि कार्यकर्ताओं में इस जीत के बाद आत्मविश्वास बढ़ेगा.
2014 के लोकसभा चुनाव भाजपा के हुकुम सिंह ने 50 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी. जबकि कैराना में तीन लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं. जो पिछले लोकसभा चुनाव में रालोद, कांग्रेस, सपा और बसपा में बंट गये थे. जिसके कारण हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की है. जबकि इस बार वहां पर महज हसन की विपक्ष की उम्मीदवार है. जिसके कारण उम्मीद की जा रही है कि यहां पर लड़ाई टक्कर की होगी.
2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक देखें तो कुल 1115421 मतों में से तकरीबन आधे मत भाजपा प्रत्याशी के खाते में गये थे. हुकुम सिंह ने 5,65,909 वोट हासिल कर सपा प्रत्याशी नाहिद हसन को 2,36,828 वोटों से पराजित किया था. उस वक्त भाजपा को सबसे ज्यादा 1,27,082 वोट गंगोह विधानसभा से और सबसे कम शामली विधानसभा सीट से 1,23,091 मिले. जबकि दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर दांव खेल रही बसपा के प्रत्याशी कंवर हसन को 160414 मत मिले थे. जबकि रालोद प्रत्याशी करतार भड़ाना को 50 हजार से कम वोट मिले थे.
लेकिन, इस बार 2014 की तुलना में स्थितियां विपरीत हैं. पिछली बार भाजपा विपक्ष में थी और इस बार में सत्ता में है. जिसके कारण जनता की नाराजगी का नुकसान उठाना पड़ेगा. इस बात को भाजपा के रणनीतिकार भी मान रहे हैं. लिहाजा संगठन ने करीब 14 विधायक और 6 मंत्रियों को वहां पर प्रचार के लिए लगाया है. भाजपा की पूरी कोशिश है कि वहां पर जाट मुस्लिम गठजोड़ न बन पाये. जो उसकी जीत के लिए सबसे बड़ी बाधा है. अगर कर्नाटक चुनाव के नतीजों को देखें तो भाजपा को ज्यादातर सीटों पर ध्रुवीकरण का फायदा मिला है. अब जब कर्नाटक के नतीजे सबसे सामने हैं, तो स्थानीय स्तर पर समीकरणों को बदलने में समय नहीं लगेगा. भाजपा नेताओं का कहना है कि कार्यकर्ताओं में पहले से ही जोश भर हुआ था, लेकिन कर्नाटक चुनाव ने उसका आत्मविश्वास और बढ़ा दिया है. जिसके कारण भाजपा की जीत तय है. वहीं विपक्षी दलों की मुश्किलें बढ़ेंगी.
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