यूपी में किसी एक दल तक सीमित नहीं परिवारवाद, हर 5 में से 1 सांसद-विधायक के सिर पर 'विरासत का ताज', जानिए आंकड़े

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यूपी में किसी एक दल तक सीमित नहीं परिवारवाद

UP News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'परिवारवाद' की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं. राज्य के लगभग 20% जन-प्रतिनिधि अपने परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं है.

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UP Politics: लखनऊ, देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'परिवारवाद' या 'राजनीतिक विरासत' की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के लगभग 20% जन-प्रतिनिधि अपने माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के अन्य दिग्गजों की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. चुनाव विश्लेषक एजेंसियों और राजनीतिक डेटा सेंटर्स के अध्ययन बताते हैं कि दल चाहे सत्ता में हो या विपक्ष में, वंशानुगत राजनीति का असर हर कोने में दिखाई देता है.

लोकसभा यूपी से 20% से अधिक सांसद 'विरासत' वाले

उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से लगभग 20% से 25% सांसद (16 से 20 नेता) मजबूत पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं. समाजवादी पार्टी में कन्नौज से सांसद अखिलेश यादव, मैनपुरी से डिंपल यादव, फिरोजाबाद से अक्षय यादव, बदायूं से आदित्य यादव, कैराना से इकरा हसन और संभल से जिया उर रहमान बर्क अपनी पारिवारिक विरासत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. वहीं, एनडीए गठबंधन में मिर्जापुर से अनुप्रिया पटेल, पीलीभीत से जितिन प्रसाद और राज्यसभा सांसद जयंत चौधरी प्रमुख नाम हैं. यह आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि यूपी की राजनीति में पारिवारिक रसूख का दबदबा सभी प्रमुख दलों में बरकरार है.

विधानसभा 403 में से करीब 60-80 विधायक राजनीतिक घरानों से

उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से लगभग 15% से 18% विधायक (60 से 80 नेता) अपने परिजनों के राजनीतिक नक्शेकदम पर चलकर चुनकर आए हैं. इनमें बीजेपी से पंकज सिंह (राजनाथ सिंह के बेटे), संदीप सिंह (कल्याण सिंह के पोते), नितिन अग्रवाल (नरेश अग्रवाल के बेटे) और श्रवण निषाद (डॉ. संजय निषाद के बेटे) शामिल हैं. वहीं, सपा से शिवपाल सिंह यादव (मुलायम सिंह के भाई) और डॉ. पल्लवी पटेल (सोनेलाल पटेल की बेटी) प्रमुख नाम हैं. ये आंकड़े साबित करते हैं कि विधानसभा में भी पारिवारिक रसूख का दबदबा कायम है.

किसी एक दल तक सीमित नहीं परिवारवाद

​चुनावी आंकड़ों का निष्कर्ष साफ दिखाता है कि 'परिवारवाद' की बहस भले ही चुनावी रैलियों का बड़ा मुद्दा बनती हो, लेकिन टिकट बंटवारे के वक्त सभी प्रमुख दल चाहे वो बीजेपी हो, सपा, कांग्रेस, आरएलडी या अपना दल जिताऊ (winnable) उम्मीदवार के रूप में राजनीतिक परिवारों से जुड़े चेहरों पर भरोसा जताते हैं. औसतन यूपी की सत्ता और संसद की दहलीज पार करने वाला हर 5वां नेता किसी न किसी राजनीतिक घराने की छत्रछाया से आता है.

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शशांक शेखर मिश्रा

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By शशांक शेखर मिश्रा

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