विवादों से दूर रहे बीएल जोशी ने इस्तीफा दिया

By Prabhat Khabar Digital Desk
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।।राजेन्द्र कुमार।।
लखनऊ:हमेशा टकराव से बचने वाले सूबे के राज्यपाल बीएल जोशी ने मंगलवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. राज्यपाल के इस कदम से केंद्र सरकार से उनका होने वाला टकराव खत्म हो गया और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पसंद के नेता को यूपी के 25वें राज्यपाल के रूप में तैनात कर सकेंगे.

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के शपथ लेने के तुरन्त बाद ही यूपीए सरकार द्वारा तैनात किए गए राज्यपालों को जल्द ही बदले जाने की अटकले लगने लगी थी. यह भी कहा गया कि भाजपा के वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह, केशरीनाथ त्रिपाठी, यशवंत सिंह, वीके मल्होत्रा, कैलाश जोशी, बलराम दास टण्डन और चमनलाल को राज्यपाल बनाया जाएगा. इन सभी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कहने पर लोकसभा चुनाव ना लड़कर पार्टी उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार किया था. पार्टी के इन नेताओं को विभिन्न राज्यों का राज्यपाल बनाने के लिए सोमवार को केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यपालों को अपना पद छोड़ने का संकेत दिया.

सूत्रों के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्रालय से मिले इस संकेत में यह साफ तौर पर बताया गया कि राज्यपाल बीएल जोशी अपने पद को छोड़ दें. केंद्र सरकार की इस मंशा पर राज्यपाल बीएल जोशी ने गहन विचार विमर्श किया. कुछ वरिष्ठ लोगों से राय ली और आज सुबह उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने का निर्णय करते हुए अपने प्रमुख सचिव को तलब किया। उनके साथ भी देर तक मंत्रणा की और अपना त्यागपत्र प्रमुख सचिव को सौंपकर उसे राष्ट्रपति भवन भेजने का निर्देश दिया. राजभवन के अधिकारियों ने राज्यपाल के आदेश पर अमल किया और प्रधानमंत्री तथा केंद्रीय गृह मंत्री के कार्यालय को भी इन अधिकारियों ने राज्यपाल के निर्णय से अवगत करा दिया.

विवादों से दूर रहे बीएल जोशी
यूपी के 24वें राज्यपाल के रूप में 28 जुलाई 2009 को शपथ लेने वाले बीएल जोशी हमेशा ही विवादों से दूर रहे. अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वह किसी पर भी नाराज नहीं हुए. बेहद शालीनता के साथ अपनी बात कही सुझाव दिए। उन्होंने राजभवन के दरवाजे आमजन के लिए खुलवाएं. हर त्योहार में बच्चों को राजभवन बुलाकर उनके साथ त्योहार मनाया. सोनिया गांधी से लेकर प्रियंका और राहुल गांधी तक उनकी सीधी पहुंच थी पर इसे उन्होंने कभी जाहिर नहीं किया.

यूपी का राज्यपाल बनने के पहले उन्हें मेघालय का राज्यपाल बनाया गया था. 12 अप्रैल 2007 को वह मेघालय के राज्यपाल बने थे. इसके बाद उनका ट्रांसफर कर अक्टूबर 2007 में उन्हें उत्तराखंड का राज्यपाल बनाया गया और 2009 में उन्हें उप्र का राज्यपाल बनाया गया. इस लिहाज से बतौर राज्यपाल उनका कार्यकाल अप्रैल 2012 में ही समाप्त हो गया था. कार्यकाल के समाप्त हो जाने के बाद लगभग दो साल तक पद पर बने रहने का कीर्तिमान बनाने वाले बीएल जोशी उत्तर प्रदेश के पहले राज्यपाल हैं। राजस्थान के नागौर जिले में जन्मे और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे बीएल जोशी दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर भी रह चुके हैं. व्यापक प्रशासनिक अनुभव रखने वाले जोशी पाकिस्तान एवं ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग तथा अमेरिका में भारतीय दूतावास से भी जुड़े रहे.

आम लोगों से फोन पर करते रहे संवाद
अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का अहसास करते हुए राज्यपाल बीएल जोशी सरकार के काम में हस्तक्षेप नहीं करते थे पर वह सूबे के राजनीतिक हालात पर नजर रखते हुए फोन पर तमाम लोगों से बतियाते जरूर थे. लोगों से फोन पर बतियाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था. रोज सुबह अखबार पढ़ते हुए उन्हें जैसे ही प्रदेश के किसी भी कोने में किसी आम आदमी की खुशी या गम में शिरकत की आवश्यकता महसूस होती वह अपने स्टॉफ से उस व्यक्ति से बात करवाने की इच्छा जाते और राजभवन का स्टाफ स्थानीय प्रशासन के सहयोग से राज्यपाल की बात उस व्यक्ति का फोन पर करवाता. अगर राज्यपाल को लगता है कि उस व्यक्ति से मिलना भी जरूरी है तो उसे राजभवन भी बुला लेते हैं.

नहीं कोई टकराव
यूपी के राज्यपाल के रूप में बीएल जोशी का किसी दल से कोई राजनीतिक टकराव नहीं हुआ. बसपा सरकार में उन्हें मायावती जितना शिद्दत से पसंद करती थी, उतना ही मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव भी उन्हें पसंद करते हैं. जिन विधेयकों पर राज्यपाल के सरकार से भिन्न विचार रहे हैं, उन्हें सार्वजनिक विवाद का विषय बनाने के बजाय बीएल जोशी ने उन्हें खामोशी से ठंडे बस्ते में डाल दिया.कहा जाता है कि जब अखिलेश सरकार के कैबिनेट मंत्री आजम खां ने सार्वजनिक रूप से राजभवन पर निशाना साधा तब भी सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने की बजाय राज्यपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को बुलाकर अपनी आपत्ति दर्ज करना ज्यादा मुनासिब समझा. और उसके बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को यह हिदायत अपने सभी मंत्रियों को हिदायत देनी पड़ी कि वह राजभवन पर कोई टीका टिप्पणी ना करें क्योंकि राजभवन पर टीका ‍िटप्पणी करना उचित नहीं है.

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