ePaper

Rourkela news: एनआइटी के शोधार्थियों ने काले टेराकोटा के निर्माण की ग्रीन टेक्नोलॉजी विकसित की

Updated at : 17 Nov 2025 11:12 PM (IST)
विज्ञापन
Rourkela news: एनआइटी के शोधार्थियों ने काले टेराकोटा के निर्माण की ग्रीन टेक्नोलॉजी विकसित की

Rourkela news: एनआइटी के शोधार्थियों ने काले टेराकोटा के निर्माण की ग्रीन टेक्नोलॉजी विकसित की है. इसे भारत सरकार से पेटेंट भी मिल गया है.

विज्ञापन

Rourkela news: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने पारंपरिक काले टेराकोटा (ब्लैक पॉटरी) के निर्माण की एक पर्यावरण-अनुकूल और आधुनिक विधि विकसित की है. यह तकनीक पारंपरिक कारीगरों की प्राचीन कला को आधुनिक सिरेमिक इंजीनियरिंग के साथ जोड़ती है, जिससे उत्पादन की गति और गुणवत्ता दोनों बढ़ती हैं. इस अभिनव कार्य का नेतृत्व सिरेमिक इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर स्वदेश कुमार प्रतिहार ने किया है. उनकी टीम में वरिष्ठ तकनीकी सहायक शिव कुमार वर्मा और शोध स्नातक डॉ रूपेश मंडल शामिल हैं. इस प्रक्रिया को भारतीय पेटेंट (संख्या 572754, आवेदन संख्या 202531008090) प्राप्त हुआ है.

पारंपरिक हस्तशिल्प के संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन के लिए होगी सहायक

टेराकोटा का भारत में प्रयोग प्राचीन काल से बर्तनों, मूर्तियों, खिलौनों और छत की टाइलों के निर्माण में व्यापक रूप से होता आया है. सामान्यतः लाल टेराकोटा हवा में पकाई गई मिट्टी से बनता है, जिसमें उपस्थित लौह तत्व ऑक्सीकरण के कारण लाल रंग प्रदान करते हैं. इसके विपरीत, काला टेराकोटा अपने विशिष्ट काले रंग और दर्पण जैसी चमक के लिए प्रसिद्ध है. भारत में पारंपरिक रूप से काले मिट्टी के बर्तन विशेष स्थानीय तकनीकों से बनाये जाते हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश की ‘निजामाबाद ब्लैक पॉटरी’ एक प्रसिद्ध उदाहरण है, जिसे जीआइ टैग भी प्राप्त है. वहां कारीगर बर्तनों पर कबीज नामक स्थानीय ग्लेज लगाकर, गोबर, भूसा और बुरादे के साथ बंद पात्र में पकाते हैं. अंतिम चरण में धुएं से बर्तनों को चमकदार काला रंग मिलता है. हालांकि, यह पूरी प्रक्रिया दो दिनों तक चलती है और इससे सल्फर ऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें उत्सर्जित होती हैं, जो पर्यावरण और श्रमिकों दोनों के लिए हानिकारक हैं. एनआइटी राउरकेला की टीम ने इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी विधि विकसित की है, जो न केवल समय बचाती है, बल्कि प्रदूषण को भी पूरी तरह समाप्त करती है. यह नयी फायरिंग प्रक्रिया सात घंटे से भी कम समय में पूरी हो जाती है और इसे किसी खुले चूल्हे या विशेष मिट्टी की आवश्यकता नहीं होती.

ग्रामीण कारीगरों के लिए नये अवसर प्रस्तुत करता है यह नवाचार

विभाग के प्रोफेसर प्रो स्वदेश कुमार प्रतिहार ने कहा कि यह सस्टेनेबल उत्पादन प्रक्रिया पारंपरिक शिल्पकारों के ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ती है. इस उत्पादन प्रक्रिया की कुंजी, तैयार किये गये बर्तनों को एक बंद वैक्यूम (वायु-रहित) चैंबर में अप्रत्यक्ष रूप से पकाने में है. इस पकाने की प्रक्रिया के दौरान कार्बनयुक्त तेल का पाइरोलिसिस (अपघटन) होता है, जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन कालिख उत्पन्न होती है. यह एक अपचायक वातावरण तैयार करती है, जो बर्तनों के काले रंग के विकास के लिए आवश्यक होता है. एनआइटी राउरकेला के शोधकर्ताओं का यह नवाचार न केवल ग्रामीण कारीगरों के लिए नये अवसर प्रस्तुत करता है, बल्कि भविष्य में ब्लैक टेराकोटा को वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक सफलता दिलाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
BIPIN KUMAR YADAV

लेखक के बारे में

By BIPIN KUMAR YADAV

BIPIN KUMAR YADAV is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola