West Singhbhum News : दो शिक्षिकाओं के संघर्ष से बच्ची को मिला जीवनदान

Author Anuj kumar
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West Singhbhum News : दो शिक्षिकाओं के संघर्ष से बच्ची को मिला जीवनदान

11 साल की बच्ची गेदने बुढ़ की पीठ पर डेढ़ किलो का ट्यूमर हो गया था

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गाेइलकेरा. गोइलकेरा की 11 साल की बच्ची गेदने बुढ़ की पीठ पर डेढ़ किलो का ट्यूमर हो गया था. परिवार की तंगहाली का आलम यह कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब थी. लाचारी और मजबूरी में परिवार ने गेदने को उसके हाल पर छोड़ दिया था. वर्ष 2022 में उसे ट्यूमर हुआ. 2024 तक बच्ची भी इसे नियति को घाव मानकर सहती रही. शरीर का जख्म नासूर हो रहा था. घाव इतने गहरा गया कि लगातार खून रिसने लगा. तभी पीठ से निकल रहे खून को शिक्षिका मुक्ति बोइपाई और सोनियामा ने देखा. दोनों शिक्षिकाओं ने तमाम झंझावतों और लगभग तीन वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद बच्ची का सफल ऑपरेशन करा दिया. ऑपरेशन के बाद बच्ची अब अपने गांव गोइलकेरा के भोक्ताउली में परिवार के साथ सामान्य दिनचर्या के साथ रह रही है.

सीएम व स्वास्थ्य मंत्री को ट्वीट करना भी काम न आया

नये सिरे से समाजसेवी देवराज हेस्सा का सहारा लेते हुए बच्ची की समस्या को मुख्यमंत्री, मंत्री इरफान अंसारी व सीएमओ को ट्वीट कर इसकी जानकारी दी गयी. लेकिन नतीजा सिफर रहा. फरवरी 2025 में बेंगलुरु की एक एनजीओ के प्रतिनिधि पंकज महाराज ने फोन कर के बच्ची के बारे में पूछा. उसका वीडियो शूट कराने के लिए बेंगलुरु लेकर आने को कहा.

न कोई इलाज न कोई दवा… फिर शुरू हुआ संघर्ष

एक दिन गोइलकेरा प्राथमिक विद्यालय भोक्ताउली की शिक्षिका मुक्ति बोइपाई और बेड़ादुइया स्कूल की शिक्षिका सोनियामा की नजर बच्ची की पीठ पर पड़ी. पूछने पर पता चला कि न कोई इलाज, न कोई दवा. तब शिक्षिका मुक्ति और सोनियामा को इस वाकये ने अंदर से झकझोर दिया. वे शिक्षिका के साथ-साथ मां के रूप में बच्ची का दामन थाम लिया. वर्ष 2022 में पांचवीं में पढ़ रही बच्ची को गोइलकेरा सीएचसी लेकर गयीं. यहां से बच्ची को सदर अस्पताल रेफर किया गया. यहां इलाज संभव नहीं था. उसे रिम्स रांची रेफर कर दिया गया.

रिम्स में भी बच्ची की खराब नियति ने नहीं छोड़ा पीछा

बच्ची लगभग एक माह रिम्स रांची में भर्ती रही. यहां भी खराब नियति ने उसे नहीं छोड़ा. एमआरआइ मशीन खराब हो गयी. तब बच्ची घर लौट गयी. दिसंबर 2024 में तब तक गेदने का ट्यूमर 1.5 किलो का हो गया था. घाव से मवाद निकलने लगा था. दोनों शिक्षिकाओं ने फिर से कवायद शुरू की. उसे सीएचसी लेकर गयीं. फिर सदर अस्पताल रेफर किया गया. चिकित्सकों ने इलाज के लिए अनुमानित खर्च 15 लाख रुपये बताया. दोनों ने उसके नाम में सुधार कर उसका राशन कार्ड बनवाया फिर आयुष्मान कार्ड बना.

निराशा में पहले एनजीओ की अनदेखी, फिर सफलता

हर जगह से निराश शिक्षिकाओं को इस एनजीओ पर भरोसा नहीं हुआ. इसके बाद एनजीओ के दो लोग गोइलकेरा पहुंचे. दोनों ने बच्ची की वीडियोग्राफी की. मार्च 2025 में एनजीओ के पंकज महाराज ने बच्ची के ऑपरेशन के लिए डॉ अनुज कुमार की अगुवाई में टीम बनने की जानकारी दी. 28 मार्च को बच्ची को रांची ले जाया गया. यहां 2 अप्रैल को उसका ऑपरेशन हुआ. टीम में डॉ शैलेश वर्मा, जतिन सेठी और डॉ ओपी श्रीवास्तव शामिल थे. 17 अप्रैल को बच्ची अपने गांव भोक्ताउली लौट आयी. बच्ची के चेहरे पर मुस्कान लौट आयी है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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