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हाटगम्हरिया : रजो पर्व आज से, कृषि कार्य से दूर रहेंगे किसान

Updated at : 13 Jun 2024 11:45 PM (IST)
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हाटगम्हरिया : रजो पर्व आज से, कृषि कार्य से दूर रहेंगे किसान

दो दिनों तक धरती पर किसी भी तरह से मिट्टी काटने, हल चलाने पर रहेगा प्रतिबंध.रजो गीत गाकर किशोरियां झूलेंगी झूला, पर्व के बाद होगा खेतीबाड़ी, गोड़ाई व बुआई का काम.

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प्रतिनिधि , हाटगम्हरिया

रजो पर्व आस्था और विश्वास का पर्व है. यह पर्व हर साल अंग्रेजी माह के जून महीने में 14 तारीख को मनाया जाता है. मान्यता है कि इसी दिन धरती माता रजस्वला होती हैं. यह पर्व ज्येष्ठ माह के अंतिम दिन मासांत आषाढ़ के प्रथम दिन संक्रांति के दिन मनाया जाता है. इसलिए रजो पर्व को मासांत पर्व भी कहा जाता है. किसानों के बीच रजो पर्व का खास महत्व है. किसान दो दिन तक अपने कृषि उपकरणों को व्यवहार में नहीं लाकर उसकी पूजा करते हैं. मासांत या संक्रांति में दो दिनों तक धरती पर किसी भी तरह से मिट्टी काटने, हल चलाने का काम नहीं करते हैं.

दो दिनों तक फल नहीं काटेंगी महिलाएं

मान्यता के अनुसार, दो दिन महिलाएं किसी फल को नहीं काटतीं हैं. बच्चे-बड़े व बूढ़े सभी वर्ग के लोग दिनभर झूला का आनंद लेते हैं. लड़कियां झूलने के साथ रजो गीत गाती हैं. गांव के आसपास जहां भी झूला लगा रहता है. बच्चियां अपना दल बनाकर वहां पहुंच जाती हैं. जिसमें झूले और गीतों की प्रतिस्पर्धा चलती है. जिसमें एक-दूसरे दल को परास्त करने का प्रयास होता है. रजो के बाद किसान खेतीबाड़ी, गोड़ाई, बुआई का काम का काम करते हैं.

झारखंड, ओडिशा व बंगाल में मनता है पर्व

इस पर्व को झारखंड, ओडिशा व प. बंगाल में मुख्य तौर से मनाया जाता है. जिसमें झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में इस पर्व की चहल-पहल अन्य राज्यों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही होती है. इस पर्व के दौरान सभी लोग नये कपड़े पहनने का आनंद लेते हैं. घरों में विभिन्न प्रकार के पकवान, मिठाइयां बनायी जाती हैं. मिठाइयों का आदान-प्रदान पड़ोसी मित्रों व परिवार के लोगों के बीच किया जाता है. इस पर्व में मुख्य तौर पर चावल,आटे और गुड़ से मिठाइयां बनायी जाती हैं. पश्चिमी सिंहभूम जंगल बहुल क्षेत्र होने से जगह-जगह पेड़ों पर झूले लगाये जाते हैं.

जगह-जगह छऊ नृत्य व सांस्कृतिक कार्यक्रम की रहती है धूम

रजो पर्व के अवसर पर झारखंड, ओडिशा व बंगाल में जगह-जगह पर छऊ नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता है. झारखंड और बंगाल में कई जगह इस नृत्य की प्रतिस्पर्धा भी की जाती है. रोजो पर्व के दिन किशोरियां सजधज कर रजो का पारंपरिक गीत गाते हुए झूले का आनंद लेती हैं. कई जगह रजो क्विन प्रतियोगिता का भी आयोजन होता है. जिसमें विजेता किशोरी को चयनकर्ताओं द्वारा रजो क्विन पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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