मां

Updated at : 27 Mar 2016 8:42 AM (IST)
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मां. इस शब्द पर शायरों और कवियों ने खूब लिखा. मां, मां की ममता और मां के संघर्ष से जुड़ी अनगिनत कहानियां हैं, फिल्में हैं. लेकिन, चाईबासा की मेंजो सुंडी की कहानी हर उपन्यास, कहानी या फिल्म की मां की कहानी से अलग है. मेंजो ने उस वक्त साहस का परिचय दिया, जब समाज के […]

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मां. इस शब्द पर शायरों और कवियों ने खूब लिखा. मां, मां की ममता और मां के संघर्ष से जुड़ी अनगिनत कहानियां हैं, फिल्में हैं. लेकिन, चाईबासा की मेंजो सुंडी की कहानी हर उपन्यास, कहानी या फिल्म की मां की कहानी से अलग है. मेंजो ने उस वक्त साहस का परिचय दिया, जब समाज के साथ उसके पति ने भी साथ छोड़ दिया. अपने दम पर इस ‘मां’ ने अपने दो बेटों को पढ़ाया. एक को इंजीनियर बनाया और दूसरे को बना रही है.
मनोज कुमार
चाईबासा :बा त 1995 की है. एक मां दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ सड़क पर आ गयी थी. पति ने भी साथ छोड़ दिया. समाज के लोगों ने डायन कह कर गांव से निकाल दिया. यहीं से शुरू हुई एक अदद छत और दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद. लेकिन, चाईबासा के कबरागुटू गांव की मेंजो सुंडी ने हार नहीं मानी.
उसने महिला समिति के आश्रम में शरण ली. वर्ष 1995 में पश्चिमी सिंहभूम के तत्कालीन डीसी अमित खरे ने मेंजो को कल्याण विभाग में मानदेय पर नौकरी दे दी. प्रतिमाह 600 रुपये मिलते थे. अशिक्षित मेंजो ने इसमें से भी पाई-पाई जोड़ना शुरू कर दिया. डाकघर में खाता खुलवाया. तब तक उसका बेटा स्कूल जाने लायक हो गया. मेंजो ने सोच लिया था कि बेटे को ऐसी तालीम दिलायेगी कि वह समाज की आंखों में आंखें डाल कर बात करने लायक बन सके. सो, टुपराय थॉमस सुंडी का नामांकन संत जेवियर्स जैसे महंगे स्कूल में कराया. डाकघर में जो कुछ पैसे जमा हुए थे, बेटे की पढ़ाई पर खर्च करने लगी.
कल्याण विभाग में नौकरी करते पांच साल बीत गये. अब मेंजो का वेतन 1,500 रुपये हो गया. इसके साथ ही खर्च भी बढ़ गये. बेटा दसवीं में था. पैसे की समस्या सामने आयी, लेकिन मेंजो ने इसका भी किसी तरह इंतजाम कर लिया. मैट्रिक की परीक्षा पास कर बेटे ने इंटर में दाखिला लिया. खर्च बढ़ा, तो मेंजो ने अपने खर्च में कटौती की. एक ही साड़ी में कई साल गुजार दिये. वर्ष 2011 में टुपराय का पॉलिटेक्निक में सेलेक्शन हो गया. दाखिले के लिए बड़ी रकम चाहिए थी. मेंजो के पास इतने पैसे नहीं थे.
सो, उसने डाकघर में जमा पूरी पूंजी निकाल ली, बकरी और मुर्गा को बेच दिया और बेटे को पढ़ने के लिए रांची भेजा. ईश्वर की कृपा हुई और इसी साल मेंजो के वेतन में दुगना इजाफा हुआ. अब उसे 3,000 रुपये प्रतिमाह मिलने लगे, लेकिन मेंजो ने यह रकम भी बेटे की पढ़ाई पर खर्च कर दी. उसके जीवन का उद्देश्य पूरा हुआ, बेटा इंजीनियर बना. अब छोटे बेटे दीपक सुंडी को आइटीआइ करवा रही है.
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