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बांझी गोलीकांड: हक की लड़ाई लड़ते मारे गये थे फादर एंथोनी समेत 15 संताल

19 अप्रैल, 1985 को पुलिस की क्रूरता से लाल हुई थी धरती, जिसमें फादर एंथोनी मुर्मू और 14 अन्य आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया था. इस मामले में विधानसभा से लेकर संसद तक हंगामा हुआ था. फादर एंथोनी आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए उनकी लड़ाई का नेतृत्व कर रहे थे

By अनुज कुमार सिन्हा
Updated Date
बांझी गोलीकांड: घटना के बाद शहीद फादर की पत्नी से मिलने पहुंचे थे शिबू सोरेन
बांझी गोलीकांड: घटना के बाद शहीद फादर की पत्नी से मिलने पहुंचे थे शिबू सोरेन
Prabhat Khabar

आदिवासियों ने झारखंड राज्य निर्माण के लिए लड़ी गयी लड़ाई में बड़ी शहादत दी है. ठीक 37 साल पहले 19 अप्रैल, 1985 को ऐसे ही एक संघर्ष में पूर्व सांसद फादर एंथोनी मुर्मू और 14 अन्य आदिवासियों को पुलिस ने मार दिया था. यह घटना घटी थी साहिबगंज से 15 किलाेमीटर दूर बांझी नामक स्थान पर.

फादर एंथाेनी 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीत कर सांसद बने थे. बाद में चुनाव में हार के बाद वे सामाजिक कार्याें से जुड़ गये थे. घटना के दिन फादर एंथाेनी आदिवासियाें काे उनका हक दिलाने के लिए लड़ी जा रही लड़ाई का नेतृत्व कर रहे थे. 13 आदिवासी ताे पुलिस फायरिंग में गलियाें आैर सड़काें पर मारे गये थे, लेकिन फादर एंथाेनी मुर्मू आैर उनके एक साथी मदन मुर्मू काे पुलिस ने अनाज गाेदाम में बंद कर उस समय मार डाला था जब वे वार्ता करने के लिए एसडीआे आैर डीएसपी से मिलने गये थे.

इस गाेलीकांड में जाे 15 लाेग मारे गये थे, वे थे-बांझी के फादर एंथाेनी मुर्मू, मदन मुर्मू, मदगू मुर्मू, खारी गांव के ठाकुर टुडू, दुमचा बेसरा, त्रिभुवन मार्डी, रक्साैल गांव के अन्ना मुर्मू, सबैया गांव के सलकाे टुडू, दुखना टुडू, पहाड़पुर गांव के इसाेर मुर्मू, बड़का मुर्मू, कुंदन मुर्मू, केंदुआ गांव के मुशी मदैया,टुडिवा के पांडा मार्डी आैर कंदाेर गांव के बड़काे हेंब्रम. उन दिनाें अपने हक के लिए लड़नेवाले आदिवासियाें काे कुचलने के लिए पुलिस किस हद तक जा सकती थी, बांझी गाेलीकांड उसका उदाहरण है.

इस गाेलीकांड पर विधानसभा से लेकर संसद तक में हंगामा हुआ था. न्यायिक आयाेग तक का गठन हुआ था. मृतकाेें के परिजनाें काे सिर्फ पांच-पांच हजार मुआवजा मिला था.

बांझी गांव का एक तालाब था घटना का कारण :

उन दिनाें उस क्षेत्र में शिबू साेरेन महाजनाें के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. इसलिए आदिवासियाें से महाजन नाराज भी थे. बांझी में एक तालाब था जहां वर्षाें से संताल मछली मारते थे. इस तालाब पर माेती भगत नामक महाजन का कब्जा था. उसने संतालाें काे मछली मारने से राेक दिया. संताल किसी भी कीमत पर मछली मारना चाहते थे.

विवाद बढ़ने पर तालाब के एक काेने में ही मछली मारने काे कहा. हंगामा तब शुरू हुआ, जब मछली मारने के समय संतालाें काे एक युवक मुटरू मुर्मू का सड़ा हुआ शव मिला. वह कुछ दिनाें से गायब था. आराेप लगा कि हत्या में माेती भगत का हाथ है आैर इसी कारण वे तालाब में मछली मारने से संतालाें काे राेक रहा था.

शव मिलते ही डर से माेती भगत फरार हाे गया, लेकिन संतालाें ने प्रशासन से शिकायत की. इसके बाद माेती भगत के घर काे संतालाें ने तहस-नहस कर दिया. मामला शांत करने के लिए प्रशासन ने उस दिन संतालाें काे माेती भगत के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया था. उसी दिन माेती भगत के गुंडाें ने बाजार में कुछ संतालाें काे पीट दिया. इससे नाराजगी आैर बढ़ गयी.

अनाज के गोदाम में फादर और उनके एक साथी की हत्या की थी पुलिस ने : इस पूरे मामले की जानकारी मिलने पर फादर एंथाेनी मुर्मू ने अन्य संतालाें के साथ बैठक की आैर माेती भगत के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की. प्रशासन पर आराेप था कि वह महाजनाें का साथ दे रहा है. फादर एंथाेनी एसडीआे आैर डीएसपी से पंचायत भवन में बात करने गये थे. बातचीत चल ही रही थी कि उसी समय माेती भगत के समर्थकाें ने वहां चिल्लाते हुए यह बात फैला दी कि संताल आगजनी व हिंसा कर रहे हैं.

वार्ता कर रहे फादर मुर्मू और उनके एक साथी मदन काे पुलिस ने उसी समय अनाज गाेदाम में बंद कर दिया और मारपीट करने के बाद दाेनाें की वहीं हत्या कर दी. उधर सड़काेें पर हिंसा हाे रही थी. पुलिस निहत्थे संतालियाेें पर फायरिंग कर रही थी. जान बचाने के लिए भाग रहे संताल जिस सुरक्षित जगह छिपने का प्रयास कर रहे थे,

वहां से निकाल कर उन्हें गाेली मार दी जा रही थी. अपने हक के लिए लड़नेवाले 15 आदिवासी इस गाेलीकांड में मारे गये थे. फादर एंथाेनी के मारे जाने से काफी हंगामा हुआ था. वे पूर्व सांसद थे और पाेप की अनुमति से चर्च का काम छाेड़ कर राजनीति में आये थे. उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी.

इतिहास के पन्नाें से गायब हाे चुके हैं शहादत देने वाले :

इस गाेलीकांड में मारे गये संतालाें के परिजनाें काे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था. सिर्फ पांच-पांच हजार मुआवजा मिला था. कुछ परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हाे गयी थी कि फायरिंग में मारे गये कुछ संतालाें की विधवाआें काे परिवार चलाने के लिए मजबूरी में दूसरी शादी करनी पड़ी थी. शहादत देनेवाले ये संताल आज झारखंड आंदाेलन के इतिहास के पन्नाें से गायब हाे गये हैं.

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