ट्रैक्टर के दौर में भी जिंदा है हल-बैल से खेती की परंपरा

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हल-बैल से खेत जोतते किसान

आधुनिक युग में भी बरहेट के किसान हल-बैल से खेती कर अपनी पुरानी परंपरा और संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं। जानिए क्यों यह खेती आज भी है किफायती।

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बरहेट, साहिबगंज: आधुनिक तकनीक और मशीनों ने खेती-किसानी के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है. ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और अन्य आधुनिक कृषि यंत्रों ने किसानों का समय और मेहनत दोनों बचाए हैं. आज चंद घंटों में कई एकड़ खेत की जुताई, बुआई, कटाई और मड़ाई का कार्य आसानी से पूरा हो जाता है. इसके बावजूद बरहेट प्रखंड के ग्रामीण इलाकों में आज भी कुछ किसान ऐसे हैं, जो अपने पूर्वजों की परंपरा को जीवित रखते हुए हल-बैल से खेती कर रहे हैं. यह केवल खेती का तरीका नहीं, बल्कि गांव की संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी एक विरासत भी है. एक समय ऐसा था, जब बिना बैलों के खेती की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. खेतों की जुताई बैलों से होती थी और बैलगाड़ियों के माध्यम से खेत से खलिहान, खलिहान से घर तथा घर से बाजार तक फसल और अनाज की ढुलाई की जाती थी. गांव के बढ़ई बैलगाड़ी के चक्के, बक्खर, हल और अन्य कृषि उपकरण तैयार करते थे. बदले में उन्हें किसानों से अनाज मिलता था. लगभग हर किसान के पास दो जोड़ी बैल हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ ट्रैक्टरों ने उनकी जगह ले ली. हालांकि, आधुनिक खेती के इस तेज दौर में भी हल-बैल और खेत का रिश्ता पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. बरहेट के कई ग्रामीण किसान आज भी दो बैलों की जोड़ी, लकड़ी के हल, जुआ, हेंगी और जुआठ के सहारे खेतों की जुताई करते हैं. यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि विकास का अर्थ अपनी संस्कृति और परंपराओं को छोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ना है. मिट्टी, पशु और किसान का रिश्ता केवल लाभ-हानि का नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का भी प्रतीक है. नयी पीढ़ी के अधिकांश किसान आधुनिक मशीनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिसके कारण खेतों में हल-बैल से जुताई का दृश्य पहले की तुलना में काफी कम दिखाई देता है. फिर भी बुजुर्गों के मन में खेतों में हल चलाते किसान और बैलों की तस्वीर आज भी ताजा है. करीब 15 वर्ष पहले तक छोटे और मध्यम जोत वाले अधिकांश किसान हल-बैल के सहारे ही खेती करते थे. धीरे-धीरे यह परंपरा विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही है, लेकिन कुछ किसान आज भी इसे जीवित रखे हुए हैं. हल-बैल से खेती का तरीका आज भी सरल व किफायती मान रहे किसान किसान दल्लू साह बताते हैं कि आधुनिक खेती में ट्रैक्टर से जुताई, बीज, खाद, डीजल, बिजली, कीटनाशक दवाइयों और मशीनों पर लगातार बढ़ता खर्च किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा है. उनका कहना है कि उनके पूर्वज चार दशक से हल-बैल के माध्यम से खेती करते आए हैं और उसी पद्धति से अच्छी फसल प्राप्त होती थी. हल-बैल से खेती करने पर मृदा की गहरी जुताई होती है, फसल बेहतर होती है और प्रदूषण भी नहीं फैलता. छोटे किसानों के लिए यह तरीका आज भी सरल और किफायती है. हालांकि आधुनिक मशीनों ने खेती को आसान बनाया है, लेकिन खेत और बैल का रिश्ता धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है. इसके बावजूद बरहेट के गांवों में यह परंपरा आज भी इस बात की गवाही देती है कि खेती केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, संस्कृति और प्रकृति की अमूल्य धरोहर भी है.


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Abdhesh Singh

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