ePaper

साहिबगंज में तैयार सूप-डलिया की महानगरों तक सप्लाई

Updated at : 22 Oct 2025 8:37 PM (IST)
विज्ञापन
साहिबगंज में तैयार सूप-डलिया की महानगरों तक सप्लाई

छठ पूजा की रौनक में मुस्लिम व्यापारियों की खूब भागीदारी

विज्ञापन

साहिबगंज छठ महापर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह पारंपरिक कारीगरों और स्थानीय व्यापारियों के लिए जीविका का एक प्रमुख स्रोत भी है. जिले में सूर्य उपासना के महापर्व छठ को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं. बाजारों में रौनक दिखने लगी है और हर तरफ छठ से जुड़े सामानों की खरीदारी हो रही है. इस पर्व में बांस से बने सूप और टोकरी का विशेष महत्व होता है. व्रती इन्हीं बांस के सूप से भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं. यही कारण है कि इन दिनों इन पारंपरिक वस्तुओं की मांग में भारी इजाफा देखने को मिल रहा है. यहां तैयार सूप और टोकरियां केवल स्थानीय बाजार में ही नहीं, बल्कि बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और यहां तक कि दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों तक भेजी जाती हैं. मुख्य रूप से कोलकाता, मालदा, पटना, छपरा, गया, भागलपुर और बनारस जैसे शहरों में इनका निर्यात होता है. जिले के एलसी रोड निवासी मोहम्मद अख्तर अली बताते हैं कि उनके परिवार में यह व्यवसाय 1960 से भी पहले से होता आ रहा है. उन्होंने 1964 में खुद इस कारोबार की शुरुआत की थी, जब सूप और टोकरी की कीमत मात्र 10 आना हुआ करती थी. एक अन्य कारोबारी एजाजुल इस्लाम उर्फ मुन्ना के अनुसार उनके दादा मोहम्मद सुलेमान अली ने इस व्यवसाय की नींव 1920 में रखी थी. दादा की मृत्यु के बाद 1956 में उनके पिता इमामुद्दीन ने इसे संभाला और 1978 से वे स्वयं अपने भाइयों के साथ इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं. वे बताते हैं कि यह कारोबार उनके परिवार में लगभग 100 वर्षों से चला आ रहा है. इस व्यापार से न केवल उनका परिवार जुड़ा है, बल्कि आसपास के हजारों परिवारों की आजीविका भी इससे चलती है. बांस के सूप का निर्माण पूरी तरह से हाथ से किया जाता है. आज भी जिले में ऐसी कोई मशीन उपलब्ध नहीं है जो इन सूपों का निर्माण कर सके. इस कार्य में जिले के आस-पास के ग्रामीण व पहाड़ी क्षेत्रों के कारीगर लगे रहते हैं. प्रमुख रूप से बांझी, मदनशाही, मरचो पहाड़, मोती पहाड़, बोआरीजोर, पचकठिया, बरहेट, कुंडली, इलाकी, संजोरी, बरमसिया, सनमौजी और संथाली इलाकों के लोग सूप बनाने के कार्य से जुड़े हैं. इन क्षेत्रों के लगभग हर घर में कोई न कोई व्यक्ति इस परंपरागत कला में पारंगत है. कारोबारियों के अनुसार हर साल करीब 50 से 70 हजार सूप गोदामों से बाहर निकलकर झारखंड, बिहार और यूपी के विभिन्न जिलों में भेजे जाते हैं. इन सूपों की पहुंच लगभग एक लाख घरों तक होती है. क्या कहते हैं कारीगर सूप बनाने का काम करने शहर के टॉकीज फिल्म रोड निवासी कोलकतिया डोम ने बताया कि 10 सूप तैयार करने में तीन व्यक्तियों को दिनभर लग जाते हैं, जो हर रोज शाम तक महाजन को पहुंचा दिया जाता है, जहां एक सूप की कीमत 40 से 30 रुपये तक दी जाती है. सूप के कारीगर राजू मलिक का कहना है कि दिनभर लगाकर तीन व्यक्ति सूप को 10 से ज्यादा तैयार नहीं कर पाते अगर मौसम खराब रहा तो इतना भी हो पाना मुश्किल हो जाता है. यह प्रक्रिया निरंतर रूप से सालों भर जारी रहती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
ABDHESH SINGH

लेखक के बारे में

By ABDHESH SINGH

ABDHESH SINGH is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola