हाई डिप्रेशन मरीज का माइक्रो करंट से होगा इलाज, रिम्स में मंगाई गई मशीन

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रांची स्थित झारखंड का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल रिम्स.

Depression Treatment: रिम्स रांची में हाई डिप्रेशन और डिमेंशिया मरीजों के इलाज के लिए टीडीसीएस मशीन शुरू की गई है. माइक्रो करंट आधारित यह नॉन इनवेसिव तकनीक शॉक थेरेपी का सुरक्षित विकल्प है. ओपीडी में ही उपचार संभव है और मरीजों में सकारात्मक सुधार देखा जा रहा है. नीचे पूरी खबर पढ़ें.

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रांची से राजीव पांडेय की रिपोर्ट

Depression Treatment: झारखंड में रांची स्थित रिम्स के साइकियाट्री विभाग में हाई डिप्रेशन और डिमेंशिया से पीड़ित मरीजों के लिए आधुनिक तकनीक आधारित इलाज की शुरुआत की गई है. अस्पताल में ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन (टीडीसीएस) मशीन मंगाई गई है, जिसके माध्यम से मरीजों को माइक्रो करंट दिया जा रहा है. इस नई तकनीक से गंभीर अवसाद से जूझ रहे मरीजों को राहत मिलने लगी है.

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कैसे होता है इलाज

अब तक ऐसे मरीजों का इलाज मुख्य रूप से इलेक्ट्रो कंवल्सिव थेरेपी (ईसीटी) के जरिए किया जाता था, जिसे आम भाषा में शॉक थेरेपी कहा जाता है. हालांकि ईसीटी प्रभावी मानी जाती है, लेकिन यह एनेस्थीसिया आधारित प्रक्रिया है और इसमें मरीज को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है. इसके विपरीत टीडीसीएस एक नॉन-इनवेसिव और अपेक्षाकृत सुरक्षित तकनीक है, जिसमें बहुत कम तीव्रता का करंट दिया जाता है और एनेस्थीसिया की आवश्यकता नहीं होती है.

क्या है टीडीसीएस तकनीक

ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन यानी टीडीसीएस एक आधुनिक न्यूरोमॉड्यूलेशन तकनीक है. इसमें दो इलेक्ट्रोड (एनोड और कैथोड) मरीज के सिर पर निर्धारित स्थानों पर लगाए जाते हैं. एनोडल स्टिमुलेशन मस्तिष्क की न्यूरॉन गतिविधि को बढ़ाता है, जबकि कैथोडल स्टिमुलेशन गतिविधि को कम करता है. इस संतुलन के जरिए मस्तिष्क के प्रभावित हिस्सों को नियंत्रित किया जाता है.

दर्द रहित प्रक्रिया

यह पूरी प्रक्रिया दर्द रहित होती है और ओपीडी में ही पूरी कर ली जाती है. मरीज उपचार के तुरंत बाद अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट सकता है. हालांकि जिन मरीजों के शरीर में मेटल इंप्लांट लगे होते हैं, उनके लिए इस तकनीक का उपयोग नहीं किया जाता है.

ईसीटी की तुलना में कम जोखिम

विशेषज्ञों के अनुसार ईसीटी प्रक्रिया में मरीज को एनेस्थीसिया देना पड़ता है और कभी-कभी दौरे भी आते हैं. इसके कारण रिकवरी में समय लगता है. वहीं टीडीसीएस में कम तीव्रता के माइक्रो करंट का उपयोग किया जाता है, जिससे जोखिम कम होता है और साइड इफेक्ट भी न्यूनतम होते हैं.

रिम्स में रोजाना 40 से 45 रोगी आते हैं

रिम्स के साइकियाट्री विभाग में प्रतिदिन 40 से 45 मनोरोगी इलाज के लिए पहुंचते हैं. इनमें आधा दर्जन से अधिक मरीज हाई डिप्रेशन और डिमेंशिया के होते हैं. ऐसे मरीजों के लिए टीडीसीएस एक नई उम्मीद बनकर उभरी है.

गढ़वा के मरीज में दिखा सकारात्मक बदलाव

टीडीसीएस तकनीक का लाभ गढ़वा जिले के एक मरीज को मिला है. यह व्यक्ति करीब 20 वर्षों तक लापता रहा था और अचानक बिहार के बख्तियारपुर में मिला. वह गंभीर मानसिक स्थिति में था और कुछ बोल पाने में असमर्थ था. परिवार से संपर्क होने के बाद उसे रिम्स के मनोरोग विभाग में भर्ती कराया गया. शुरुआती 40 दिनों तक पारंपरिक उपचार दिया गया, जिससे उसमें कुछ सुधार दिखा. वह खुद खाना खाने और कपड़े बदलने लगा. इसके बाद टीडीसीएस थेरेपी शुरू की गई. कुछ सत्रों के बाद मरीज ने आसपास के लोगों को पहचानना शुरू कर दिया और अपनी पत्नी को भी पहचानने लगा. डॉक्टरों का कहना है कि यह उपचार उसके लिए नई आशा लेकर आया है.

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विभागाध्यक्ष ने क्या कहा

साइकियाट्री विभाग के एचओडी डॉ अजय बाखला ने बताया कि टीडीसीएस मशीन मंगा ली गई है और इसका उपयोग ओपीडी में हाई डिप्रेशन और डिमेंशिया के मरीजों के इलाज में किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि शॉक थेरेपी की जगह अब माइक्रो करंट तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि इस तकनीक का उपयोग लकवा से ठीक हुए मरीजों की अपंगता कम करने में भी किया जाता है. इससे मस्तिष्क की गतिविधियों को संतुलित कर बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं.

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