Ranchi News : आखिर क्यों दरगाहों तक सिमटकर रह गयी कव्वाली

Updated at : 13 Sep 2025 7:08 PM (IST)
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Ranchi News : आखिर क्यों दरगाहों तक सिमटकर रह गयी कव्वाली

डोरंडा स्थित दरगाह में हजरत कुतुबुद्दीन रिसालदार शाह बाबा का सालना उर्स शुरू हो चुका है. उर्स में हर बार की तरह इस बार भी कव्वालियों के मुकाबले होंगे.

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रांची(प्रवीण मुंडा).

डोरंडा स्थित दरगाह में हजरत कुतुबुद्दीन रिसालदार शाह बाबा का सालना उर्स शुरू हो चुका है. उर्स में हर बार की तरह इस बार भी कव्वालियों के मुकाबले होंगे. दरगाह कमेटी के उपाध्यक्ष रिजवान हुसैन ने कहा कि इस बार भी मुंबई के कव्वाल जुनैद सुल्तानी और मुजतबा अजीज नाजा अपनी कव्वाली पेश करेंगे. ये दोनों पिछले साल भी उर्स के मौके पर रांची आये थे. जबकि रांची के ही कव्वाल कौशर नाज, शहंशाह ब्रदर्स सहित अन्य कव्वाल रोजाना अपनी कव्वाली पेश कर रहे हैं. एक दौर था जब संयुक्त बिहार में कई मौकों पर कव्वाली का आयोजन होता था. लोगों का कहना है कि कव्वाली सिर्फ मुस्लिम पर्व त्योहारों पर ही नहीं बल्कि, हिंदुओं के पर्व-त्योहारों पर भी होता था. अब समय बदल गया है. कव्वाली सिर्फ दरगाहों या कुछ सालाना जलसों तक ही सीमित हो गयी है. डोरंडा निवासी कौशर जानी दरगाह के दरबारी कव्वाल हैं. हर साल उर्स के मौके पर कव्वाली के लिए हाजिर होते हैं. इनके लिए कव्वाली एक इबादत की तरह है. वे कहते हैं कि लोगों में कव्वाली को लेकर अब वह गंभीरता नहीं रही. कव्वाली को भी लोग सिर्फ डीजे, डांस और मनोरंजन की चीज की तरह देखते हैं. अब अच्छे कव्वाल भी नहीं रहे. नयी पीढ़ी में रुझान भी नहीं है. ऐसे में धीरे-धीरे यह कला खत्म होती दिख रही है.

लेखक एमजेड खान कहते हैं कि कव्वाली, सूफीवाद के तहत भक्ति संगीत की एक धारा के रूप में ऊभरकर आयी. भारतीय उपमहाद्वीप में इसका इतिहास 700 साल पुराना है. दरगाहों पर सूफियों ने ध्यान और इबादत के लिए कव्वालियों का प्रचलन शुरू किया था. वहां से यह धीरे-धीरे आम लोगों की जिंदगी तक पहुंची. वे कहते हैं कव्वाली हिंदुस्तानी तहजीब (संस्कृति) की महत्वपूर्ण कला है, जिसके मुरीद मुस्लिम और हिंदू दोनों ही थे. पुरानी हिंदी फिल्मों ने कव्वालियों को बढ़ावा देने का काम किया. मुगले आजम, पाकीजा जैसी फिल्मों की कव्वालियां आज भी लोगों के जेहन में बसती है. एमजेड खान कहते हैं अब इसे सिर्फ मुस्लिमों की चीज माना जाता है और मुस्लिम तबके में भी कुछ लोग इसे गैर इस्लामिक मानते हैं. जबकि यह भारतीय उपमहाद्वीप की चीज है और जिसे हिंदू और मुसलमान, दोनों ने ही अपनाया था.

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