2018 से सिमटते चले गए रांची के जल स्रोत और वेटलैंड, गहरा गया जलसंकट

झारखंड की राजधानी 2018 के बाद बढ़ता चला गया जल संकट.
Water Crisis: रांची में 2018 से 2025 के बीच जल स्रोत और वेटलैंड तेजी से सिमट गए हैं. सैटेलाइट अध्ययन में कई वार्डों में जलाशयों का क्षेत्रफल घटने का खुलासा हुआ. इससे भूजल स्तर गिरा और जलसंकट गहराया. नगर निगम चुनाव में पेयजल बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है. पूरी खबर नीचे पढ़ें.
रांची से क्रांति दीप की रिपोर्ट
Water Crisis: झारखंड की राजधानी रांची में नगर निगम चुनाव के लिए 23 को मतदान होना है. विभिन्न वार्डों के प्रत्याशियों ने सुविधाएं दिलाने और मुद्दों की बात करने का वादा किया है. इन मुद्दों में पेयजल और जल संकट की समस्या भी प्रमुख रूप से शामिल है. आज के दौर में विभिन्न वार्डों के लोग जल स्तर कम होने की समस्या से जूझ रहे हैं. गर्मी शुरू होते ही हजारों बोरिंग से पानी आना बंद हो जाता है.
क्या कहते हैं बुजुर्ग
पुराने लोगों के अनुसार, रांची में पहले कई जल स्रोत हुआ करते थे, लेकिन वह धीरे-धीरे खत्म होते चले गये. ऐसे में एक्सआइएसएस रांची की पीजीसीएम-जीआइएस विभाग की टीम ने प्रभात खबर के लिए सेटेलाइट इमेज के माध्यम से 2018 में मौजूद वाटर बॉडीज का पता लगाया. जीआइएस विभाग के को-ऑर्डिनेटर डॉ प्रकाश चंद्र दास ने बताया कि 2018 नवंबर की सेटेलाइट इमेज के माध्यम से उस समय शहर में मौजूद वॉटर बॉडीज व आर्द्रभूमि (वेटलैंड) का पता लगाया गया. इस दौरान कई वार्ड में जलाशय व आर्द्रभूमि नजर आयी, लेकिन धीरे-धीरे उनका क्षेत्रफल कम होता गया. 2025 नवंबर की सेटेलाइट इमेज से तुलना करने पर इसमें काफी बदलाव नजर आये. कई जगहों पर वाटर बॉडीज आंशिक, तो कई जगहों पर लगभग पूरी तरह खत्म हो गये हैं. हालांकि ये वाटर बॉडीज या वेटलैंड सरकारी या निजी भूमि पर हैं, इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं.
पर्यावरण के लिए फायदेमंद हैं वेटलैंड
वेटलैंड यानी आर्द्रभूमि ऐसा भूभाग होता है, जहां की मिट्टी पूरी तरह से पानी से संतृप्त (सैचुरेटेड) होती है या जो साल भर या किसी विशेष मौसम में पानी से ढंका रहता है. यह स्पंज की तरह होता है. यह पर्यावरण के लिए काफी फायदेमंद होता है. इसके आसपास हरियाली और जैव विविधता होती है. यहां का तापमान व वातावरण नियंत्रित होता है. ये जल शोधन (वाटर फिल्टरेशन) का काम करते हैं. जिस कारण इनको इकोलॉजिकल किडनी भी कहा जाता है. यह बारिश के पानी को जमा करता है. ग्रांउड वाटर रीचार्ज करता है. डॉ. प्रकाश चंद्र दास बताते है कि ये वेटलैंड शहरी बाढ़ को भी नियंत्रण करने में काफी कारगर होते हैं. ऐसे में इनका संरक्षण और रखरखाव बहुत आवश्यक है.
वार्ड-13 सामलौंग, चुटिया
यह सेटेलाइट इमेज वार्ड-13 सामलौंग, चुटिया ऑक्सफोर्ड स्कूल के पास की है. 2018 में यहां पर लगभग 1.28 एकड़ जगह पर जलाशय हुआ करता था. जहां धीरे धीरे निर्माण कार्य होते गये और जलाशय सिमटता गया. 2025 नंवबर की सेटेलाइट इमेज में ज्यादातर जगह पर निर्माण कार्य नजर आते हैं.
वार्ड-19 प्लाजा चौक और ईस्ट जेल रोड
यह सेटेलाइट इमेज वार्ड-19 प्लाजा चौक और ईस्ट जेल रोड क्षेत्र की है. यहां पर 2018 नवंबर के माह में 4.5 एकड़ क्षेत्र में आर्द्रभूमि (वेटलैंड) व जलाशय हुआ करता था, लेकिन अब यहां पर कुछ क्षेत्र में पार्क का निर्माण व कुछ क्षेत्र में रेसिडेंशियल कांप्लेक्स नजर आते हैं. जिस कारण वेटलैंड व जलाशय का क्षेत्रफल काफी कम हो गया है.
वार्ड-36 रातू रोड क्षेत्र
यह इमेज वार्ड-36 रातू रोड क्षेत्र की है. यहां पर 2018 में 0.92 एकड़ में आर्द्रभूमि (वेटलैंड) हुआ करती थी. बारिश के पानी को जमा करने व ग्राउंड वाटर रिचार्ज के लिए ये काफी फायदेमंद होती है. लेकिन यहां पर भी धीरे-धीरे निर्माण कार्य होते गये. आर्द्रभूमि (वेटलैंड) का क्षेत्र कम होता गया.
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वार्ड-36 मधुकम
यह इमेज वार्ड-36 मधुकम क्षेत्र की है. 2018 में यहां पर लगभग 2.40 एकड़ जगह पर जलाशय हुआ करता था. लेकिन इस क्षेत्र में भी निर्माण कार्य होने से जलाशय का क्षेत्रफल कम होता गया. अब लगभग खत्म हो गया है.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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