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जिंदगियां दांव पर ! झारखंड में मॉडिफाइड स्लीपर बसें, जैसलमेर हादसे से भी नहीं चेते जवाबदेह

Updated at : 19 Oct 2025 12:33 AM (IST)
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जिंदगियां दांव पर ! झारखंड में मॉडिफाइड स्लीपर बसें, जैसलमेर हादसे से भी नहीं चेते जवाबदेह

राजस्थान के जैसलमेर में एसी स्लीपर बस में आग लगने से 20 लोगों की दर्दनाक मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है.

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रांची. राजस्थान के जैसलमेर में एसी स्लीपर बस में आग लगने से 20 लोगों की दर्दनाक मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है. हादसे का कारण बस का मॉडिफाइड होना बताया गया. यह चेतावनी है कि अगर अब भी हम नहीं चेते, तो झारखंड की सड़कों पर भी बेकसूर जिंदगियां जल सकती हैं. झारखंड में भी नियमों को ताक पर रखकर एसी स्लीपर बसों का धड़ल्ले से परिचालन हो रहा है. हाल ही में झारखंड और बिहार के बीच बसों के नियम विरुद्ध संचालन को लेकर हाइकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाये थे. रांची से पाकुड़ जा रही सानिया बस (जेएच 01 बीसी 6153) में महेशपुर के पास आग लग गयी थी. उस वक्त बस में 25-30 यात्री सवार थे. गनीमत रही कि कोई हताहत नहीं हुआ. लेकिन हर बार ऐसा लक हो इसकी कोई गारंटी नहीं. रामगढ़, हजारीबाग समेत कई जगहों पर पहले भी बसों में आग लग चुकी है. इसके बावजूद जवाबदेह विभागों की चुप्पी बनी हुई है. फिलहाल राज्य में 10 स्लीपर बसें, 2/1 सीट स्लीपर 11 बसें और 2/1 सीट स्लीपर 100 से ज्यादा बसें चल रही हैं. इसके अलावा एसी सीट वाली बसों की संख्या 500 से अधिक है.

यात्री बस के साथ ट्रक का भी काम

रांची समेत राज्य के कई हिस्सों से रात में चलने वाली अधिकांश सीट स्लीपर बसों में यात्रियों के साथ-साथ छत पर माल की ढुलाई भी होती है. इससे बस का सेंटर ऑफ ग्रेविटी गड़बड़ा जाता है, जिससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. बसों में सीट से ज्यादा यात्रियों को बैठाने की बात भी सामने आती है. स्लीपर बसों के संचालन को लेकर विभाग की ओर से कोई ठोस मानक तय नहीं है. बस संचालकों के अनुसार समय का निर्धारण होता है, जबकि यात्रियों की सुविधा के अनुसार संचालन होना चाहिए.

स्लीपर बसों के लिए नियमों की अनदेखी

झारखंड में एएसआइ-119 के निर्देशों की अनदेखी कर 12 मीटर वाली बसों में 2/1 सीट स्लीपर की जगह 2/2 सीट स्लीपर बसें चल रही हैं. इससे बस में सीट की संख्या 60 और स्लीपर की संख्या 20 हो जाती है, जो नियम विरुद्ध है. नियमानुसार 12 मीटर की बस में टू-लेयर स्लीपर की कुल संख्या 30 होनी चाहिए. अगर सीट और स्लीपर दोनों हैं, तो सीट 32 और स्लीपर 15 होने चाहिए. लेकिन झारखंड में 2/1 गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कराकर 2/2 सीट स्लीपर बनाकर बसें चलायी जा रही हैं. जबकि रजिस्ट्रेशन से पहले गाड़ी का निरीक्षण और एएसआई-119 के डायग्राम से भौतिक सत्यापन जरूरी होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि दोषी कौन है. बस मालिक, बॉडी बिल्डर या परिवहन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी? इसी तरह 13.5 मीटर की बसों में सीट की संख्या 36 और स्लीपर की संख्या 18 होनी चाहिए, लेकिन यहां भी 2/2 सीट स्लीपर बनाकर सीट 48 और स्लीपर 24 कर दिया जा रहा है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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