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'बाबा कार्तिक उरांव आदिवासियों के थे मसीहा' पुण्यतिथि पर झारखंड ने किया याद

Updated at : 08 Dec 2024 6:36 PM (IST)
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रांची के कार्तिक उरांव चौक पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते केंद्रीय सरना समिति के पदाधिकारी

रांची के कार्तिक उरांव चौक पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते केंद्रीय सरना समिति के पदाधिकारी

केंद्रीय सरना समिति ने बाबा कार्तिक उरांव की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की. रांची के हरमू स्थित कार्तिक उरांव चौक पर समिति के सदस्यों ने उनके द्वारा किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए याद कर उन्हें नमन किया.

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रांची: झारखंड के ‘काला हीरा’ कार्तिक उरांव की पुण्यतिथि रविवार को रांची समेत कई जगहों पर मनायी गयी. केंद्रीय सरना समिति ने रविवार को पंखराज बाबा कार्तिक उरांव की पुण्यतिथि पर रांची के हरमू बाईपास रोड स्थित कार्तिक उरांव चौक पर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी. मौके पर केंद्रीय सरना समिति के महासचिव संजय तिर्की, महिला शाखा अध्यक्ष नीरा टोप्पो, शिला मिंज, सहाय तिर्की, फूलदेव भगत समेत अन्य मौजूद थे.

केंद्रीय सरना समिति ने दी श्रद्धांजलि

केंद्रीय सरना समिति के केंद्रीय अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा कि बाबा कार्तिक उरांव कुशल अभियंता, प्रशासक, महान शिक्षाविद, समाज सुधारक और दूरद्रष्टा थे. बाबा कार्तिक उरांव आदिवासी समाज के मसीहा थे. उनका जन्म गुमला जिले के करौंदा लिटा टोली गांव में हुआ था. स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए थे. उन्होंने अनेक डिग्रियां हासिल कीं. ब्रिटेन में ऑटोनॉमी पावर प्लांट हिंक्ले के निर्माण में अहम भूमिका निभायी. रांची में एचईसी, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रिम्स आदि का डिजाइन किया. उन्होंने आदिवासी समाज की दयनीय स्थिति को देखते हुए नौकरी से रिजाइन कर समाज सेवा शुरू की.

धर्मांतरण का विरोध करते थे कार्तिक उरांव-फूलचंद तिर्की

फूलचंद तिर्की ने कहा कि कार्तिक उरांव लोहरदगा से सांसद चुने गए. संसद में आदिवासी समाज के मुद्दों को प्रखरता से रखा. वे ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण का विरोध करते थे. दोहरा लाभ का भी विरोध करते थे. उन्होंने संसद में अलग धर्म कोड की मांग रखी. उसे 348 सांसदों का समर्थन प्राप्त था, परंतु तत्कालीन कांग्रेस की सरकार में आदिवासियों का अलग धर्मकोड का मुद्दा हाशिए पर चला गया. तब बाबा कार्तिक उरांव ने 20 वर्ष की काली रात नामक पुस्तक लिखी थी. 8 दिसंबर 1981 को संसद भवन के फर्श पर गिरने से हृदय गति रुकने की वजह से उनका निधन हो गया. इस तरह आदिवासी समाज ने एक महान विभूति को खो दिया.

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Guru Swarup Mishra

लेखक के बारे में

By Guru Swarup Mishra

मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.

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