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Jharkhand Village Story: बकरी पालन कर समृद्ध हो रहे रांची के इस गांव के 300 से अधिक परिवार

Updated at : 14 Mar 2024 3:34 PM (IST)
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Jharkhand Village Story: बकरी पालन कर समृद्ध हो रहे रांची के इस गांव के 300 से अधिक परिवार

Jharkhand Village Story: झारखंड में तरह-तरह के गांव मिलेंगे. एक से एक अजीब-ओ-गरीब नाम वाले गांव हैं, तो काम से भी कई गांव बेहद अजीब-ओ-गरीब हैं.

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Jharkhand Village Story: झारखंड में तरह-तरह के गांव मिलेंगे. एक से एक अजीब-ओ-गरीब नाम वाले गांव हैं, तो काम से भी कई गांव बेहद अजीब-ओ-गरीब हैं. इनकी कहानी भी अजब-गजब है. किसी गांव का नाम लेने में लोगों को शर्म आती है, तो किसी गांव का नाम सुनकर लोगों को हंसी आ जाती है. कहीं बकरियां लोगों के जीवन का सहारा बनी हुईं हैं.

Jharkhand के इस गांव में रहते हैं 1000 से अधिक लोग

आज हम ऐसे ही एक गांव के बारे में बताने जा रहे हैं. इस गांव में इंसान की आबादी से 10 गुणा बकरियां हैं. जी हां. बकरियों की आबादी इंसान से ज्यादा है. झारखंड की राजधानी रांची से सटे इस गांव में कुल 300 से कुछ अधिक मकान हैं. उनमें 1,000 लोग रहते हैं. इस गांव में बकरियों की संख्या 10 हजार से अधिक है.

बकरियों की मदद से समृद्ध और आत्मनिर्भर हो रहे लोग

गांव के लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं. ऐसे में रोजी-रोजगार के लिए उन्हें पलायन करना पड़ता था. मजदूरी करके जीवन यापन करते थे. लेकिन, अब ये लोग समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं. हम बात कर रहे हैं चामगुरु गांव की. राजधानी रांची से महज 25 किलोमीटर की दूरी पर है यह गांव. इस गांव के लगभग हर घर में बकरी पालन होता है. बकरी पालन ने उन्हें समृद्ध भी बनाया है और आत्मनिर्भर भी.

चामगुरु गांव के 90 फीसदी लोग करते हैं बकरी पालन

आंकड़े बताते हैं कि झारखंड की राजधानी रांची के इस गांव में 90 प्रतिशत परिवार बकरी का पालन करता है. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने इस गांव को गोद ले रखा है. इसका असर यह हुआ कि लोगों को बकरी पालन करने में सुविधा होने लगी. बकरियों को क्या खिलाना है, अगर वे बीमार पड़ जातीं हैं, तो उनका इलाज कहां और कैसे करवाना है, इन सबकी जानकारी बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कर्मचारी और अधिकारी उन्हें दे देते हैं.

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रोजी-रोटी का जरिया हैं बकरियां

इस गांव में रहने वाली विमला देवी की मानें, तो बकरी पालन करने वाले हर परिवार में 30 से 40 बकरियां मिल जाएंगी. यहां इंसान कम, बकरियां ज्यादा हैं. हमारे गांव के लोगों की रोजी-रोटी बकरियां ही हैं. इसलिए बच्चे से लेकर बड़े और बुजुर्ग तक आपको गांव में बकरी चराते मिल जाएंगे. अगर आप पूछ लें कि आप सिर्फ बकरी ही क्यों चराते हैं, तो गांव के लोग कहेंगे कि हमें कुछ और आता ही नहीं. हम शुरू से बकरी ही चरा रहे हैं.

बीमारी का इलाज कराना हो या बेटी का ब्याह, सहारा हैं बकरियां

हालांकि, ऐसा नहीं है कि इस गांव के लोग सिर्फ बकरी ही चराते हैं. कुछ परिवार के बच्चे पढ़ते भी हैं. उनकी पढ़ाई का खर्चा इन्हीं बकरियों को बेचकर निकलता है. अगर बेटी की शादी करनी हो, तो बकरी बेचकर ही उसके लिए पैसे जुटाए जाते हैं. बीमारी का इलाज कराना हो या कोई और जरूरी काम, जब भी पैसे की जरूरत पड़ती है, बकरी बेचकर उसका जुगाड़ कर लेते हैं. इसलिए बकरियों को इस गांव के लोग एटीएम मशीन से कम नहीं समझते.

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वजन के हिसाब से बिकतीं हैं बकरियां

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अशोक की मानें, तो गांव के लोग बकरी पालन में निपुण हैं. बकरी पालन के सारे संसाधन जुटाने में विश्वविद्यालय इनकी मदद करता है. सरकार की कई योजनाओं की भी इन्हें जानकारी दी जाती है, जिसकी वजह से इनको फायदा होता है. बता दें कि बकरियों को आमतौर पर बाजार में बेचा जाता है. शादी-ब्याह और पर्व के दौरान लोग इनके गांव से बकरियां खरीदकर ले जाते हैं. वजन के हिसाब से बकरियां बिकतीं हैं.

विश्व में बकरियों की संख्या?

यहां बताना प्रासंगिक होगा कि आज दुनिया भर में बकरियों की करीब 300 से अधिक नस्लें हैं. सिर्फ भारत में 20 नस्ल की बकरियां हैं. यूनाइटेड नेशंस के फूड एंड एग्रिकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2011 में विश्व में बकरियों की संख्या 92.4 करोड़ से अधिक थी.

बकरियों का मुख्य भोजन क्या है?

बकरियों का मुख्य भोजन आमतौर पर हरा चारा ही है. इन्हें हरा चारा खिलाने से दाने की बचत होती है. कहा जाता है कि अगर बकरियों ने किसी पौधे को चर लिया यानी खा लिया, तो उसकी वृद्धि रुक जाती है. लेकिन, यह तथ्य नहीं है. यह एक धारणा है, जो गलत है. आपको बता दें कि बकरियां कभी भी पौधे को नहीं खातीं. उसकी पत्तियों को खाती है और इस दौरान उसकी कुछ कोमल शाखाओं को भी चबा जातीं हैं.

बकरी पालन के क्या होते हैं फायदे?

अगर आप बकरी का पालन करते हैं, तो इससे दूध और मांस दोनों मिलता है. बकरी की खाल, उसके बाल और रेशों का भी अलग-अलग व्यावसायिक महत्व है. बकरी के मल-मूत्र का भी खात के रूप में इस्तेमाल होता है. इस तरह देखें कि छोटे आकार की बकरियों को पालने के कई फायदे होते हैं. छोटे किसान इससे आत्मनिर्भर हो सकते हैं.

किस बीमारी में कारगर है बकरी का दूध?

बकरी के दूध में कॉलेस्ट्रॉल बहुत कम होता है. यह सुपाच्य है. इसके दूध में मैग्नीशियम की मात्रा अच्छी-खासी होती है. यह दिल के लिए बेहद फायदेमंद है. दिल की धड़कन को बनाए रखने में मैग्नीशियम मददगार होता है.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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