रांची: रिम्स में इलाज कराने से पहले देना पड़ता है दर्द का इम्तिहान

टूटे फर्श पर मरीज को वार्ड में ले जाते परिजन.
राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में मरीजों को इलाज के लिए पहुंचने से पहले ही टूटे फर्श और बदहाल रास्तों से गुजरना पड़ता है, जिससे उनका दर्द बढ़ जाता है. तीन साल से यही स्थिति बनी हुई है, बावजूद इसके सुधार के कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं.
RIMS News: राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में इलाज की उम्मीद लेकर आनेवाले मरीजों का दर्द वार्ड तक पहुंचने से पहले ही बढ़ जाता है. वजह है अस्पताल के टूटे हुए फर्श, ट्रॉली और व्हीलचेयर पर ले जाये जा रहे मरीज जो हर कदम पर जोरदार झटके खाते हैं. सबसे ज्यादा परेशानी गंभीर मरीजों को होती है, जिन्हें दर्द के बीच किसी तरह वार्ड तक पहुंचाया जाता है. हैरानी की बात यह है कि यह हाल एक-दो दिन का नहीं, बल्कि पिछले तीन साल से बना हुआ है.
टूटे फर्श और जर्जर रास्ते बढ़ा रहे मरीजों की मुश्किलें
रिम्स में हर दिन 2500 से ज्यादा मरीज ओपीडी में इलाज के लिए पहुंचते हैं. वहीं सेंट्रल इमरजेंसी में 275 से अधिक गंभीर मरीज आते हैं. इनमें से 45 से 50 मरीजों को अलग-अलग वार्ड तक पहुंचने का रास्ता ही मरीजों के लिए नयी परेशानी बन गया है. मेडिसिन और सर्जरी आइसीयू के बाहर की स्थिति सबसे खराब है, जहां रोजाना 10 से 15 गंभीर मरीज भर्ती होते हैं. मरीजों के परिजन भी डर में रहते हैं कि कहीं वार्ड तक पहुंचाने के दौरान ही कोई अनहोनी न हो जाये. विडंबना यह है कि 30 सितंबर 2023 को भी प्रभात खबर ने टूटे फर्श और बदहाल वार्ड की स्थिति को प्रमुखता से उठाया था. इसके बावजूद आज तक हालात नहीं बदले.
दावा : मरम्मत चल रही लेकिन हकीकत कुछ और
रिम्स के पीआरओ डॉ. शिशिर कुमार का कहना है कि जेएसबीसीसीएल को भवन के जीर्णोद्धार का काम दिया गया है. पहले भवन के बाहरी पिलरों को मजबूत किया जा रहा है, उसके बाद वार्डों की मरम्मत होगी. मरीजों को शिफ्ट करते हुए चरणबद्ध तरीके से काम किया जा रहा है. लेकिन मौके की तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है. निर्माण की रफ्तार इतनी धीमी है कि लोगों को डर है कहीं पूरे रिम्स के जीर्णोद्धार में वर्षों न लग जाये. कम मजदूरों के कारण काम सुस्त है और इसका खामियाजा रोज मरीज भुगत रहे हैं.
100 कमरों का पेइंग वार्ड 76 तक सिमटा, 32 की स्थिति जर्जर
रिम्स में 28 करोड़ रुपये की लागत से तैयार 100 कमरों का पेडंग वार्ड सुविधाओं के अभाव में बदहाल स्थिति में पहुंच गया है. वर्तमान में वार्ड के केवल 76 कमरे ही उपयोग में हैं, जबकि 32 कमरे जर्जर हो चुके हैं और उन्हें तत्काल मरम्मत की जरूरत है. इसके बावजूद रिम्स प्रशासन मरीजों से प्रति कमरा 1,500 रुपये प्रतिदिन शुल्क वसूल रहा है. बताया जाता है कि कमरों की मरम्मत की प्रक्रिया पिछले दो वर्षों से चल रही है, लेकिन अब तक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है. पेइंग वार्ड में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि कई कमरों की दीवारों का प्लास्टर उखड़ चुका है. बाथरूम की स्थिति खराब है, जबकि टीवी और फ्रिज जैसी सुविधाएं भी कई कमरों में नहीं हैं. उनका कहना है कि जब निजी अस्पतालों जैसी सुविधाओं के नाम पर शुल्क लिया जा रहा है, तो पहले व्यवस्था को बेहतर बनाया जाना चाहिए.
सिर्फ दूसरे तल्ले पर भर्ती हो रहे मरीज
रिम्स के पेइंग वार्ड में सिर्फ दूसरे तल्ले का उपयोग निजी अस्पताल की तर्ज पर मरीजों के रहने के लिए किया जा रहा है, वर्तमान में यहां पांच से छह मरीज भर्ती है. वहीं, तीसरे तल्ले के कमरों का उपयोग आयुष्मान भारत योजना के मरीजों और इमरजेंसी से यहां शिफ्ट हुए मरीजों के लिए किया जाता है. प्रथम तल्ला पर सभी 24 कमरों में नेफ्रोप्लस का डायलिसिस सेंटर संचालित किया जा रहा है. वहीं, ग्राउंड फ्लोर पर कुपोषण का रेफरल सेंटर है.
रिम्स के पीआरओ ने कहा
रिम्स के पीआरओ डॉ. शिशिर कुमार ने बताया कि पेइंग वार्ड के 32 कमरों की स्थिति फिलहाल खराब है, हालांकि इनमें से जो कमरे बेहतर हालत में हैं, उनमें मरीजों को रखा जा रहा है. उन्होंने कहा कि वार्ड की मरम्मत और सुधार के लिए स्वास्थ्य विभाग ने निर्देश जारी किए हैं तथा इसकी जिम्मेदारी भवन निर्माण विभाग को सौंपी गई है. उन्होंने उम्मीद जताई कि मरम्मत कार्य पूरा होने के बाद पेइंग वार्ड का संचालन जल्द ही बेहतर स्थिति में शुरू हो जाएगा.
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लेखक के बारे में
By भूमि शर्मा
भूमि शर्मा पिछले दो वर्षों से डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल के साथ बतौर कंटेंट राइटर जुड़ी हुई हैं. वर्तमान में वह मुख्य रूप से जमशेदपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों की खबरों को कवर करती हैं. इससे पहले वह एजुकेशन बीट और झारखंड बीट पर भी काम कर चुकी हैं, जहां उन्होंने शैक्षणिक बदलावों और राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर लेखन किया है।
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