Jharkhand News: झारखंड के नदियों की स्थिति बेहद खराब, जलीय जीवों के लिए भी खतरनाक
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 17 May 2022 10:09 AM
झारखंड की अधिकतर नदियां बेहद प्रदूषित है. गुणवत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह जलीय जीवों के लिए भी ठीक नहीं है. नेशनल वाटर क्वालिटी मॉनिटरिंग प्रोग्राम द्वारा कराये गये सर्व में इसकी जानकारी मिली है
रांची: झारखंड की ज्यादातर नदियां प्रदूषित हैं. नदियों के पानी का स्तर बहुत ही खराब है. यह पीने लायक तो छोड़िये, जलीय जीवों के लिए भी ठीक नहीं है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नेशनल वाटर क्वालिटी मॉनिटरिंग प्रोग्राम (एनडब्ल्यूएमपी) के तहत जलस्रोतों की गुणवत्ता पर कराये गये सर्वे में यह रिपोर्ट सामने आयी है. बोर्ड की ताजा रिपोर्ट में इसका जिक्र है कि राज्य की ज्यादातर नदियों की स्थिति अच्छी नहीं है.
बोर्ड ने राज्य की छह नदियों को अपने सर्वे में शामिल किया था. इसमें दुमका की कुर्वा और धनबाद की जमुनिया व कतारी नदी शामिल हैं. इसके अलावा जमशेदपुर की खरकई, मनोहरपुर की कोईना के साथ-साथ राजधानी की स्वर्णरेखा और हरमू नदी की जल की गुणवत्ता की जांच करायी गयी थी. जांच में नदियों के जल में ऑक्सीजन, पोटेंसियल ऑफ हाइड्रोजन (पीएच), बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी), नाइट्रेट, कोलीफॉर्म की जांच की गयी थी.
हरमू नदी के पानी में ऑक्सीजन (बीओडी) का स्तर मात्र दो मिलीग्राम प्रति लीटर है. इसका मतलब है कि यहां के पानी में ऑक्सीजन की मात्रा नहीं के बराबर है. यह जलीय प्राणियों के लिए भी खतरनाक है. पानी की बूंद में पांच मिली ग्राम से कम ऑक्सीजन की मात्रा जलीय जीवन के लिए भी हानिकारक है. अॉक्सीजन की मात्रा अगर एक से दो मिलीग्राम प्रति लीटर हो, तो वहां मछली भी नहीं रह सकती है.
बीओडी ऑक्सीजन की वह मात्रा है, जो जल में कार्बनिक पदार्थों के जैव रासायनिक अपघटन के लिए आवश्यक होता है. इससे यह पता चलता है कि जलीय प्राणियों की संख्या बढ़ रही है या नहीं. जल प्रदूषण की मात्रा बीओडी से मापी जाती है. बीओडी की मात्रा जितनी अधिक होगी, जल से ऑक्सीजन उतनी तेजी से घटेगा. इससे जलीय जीव का दम घुटने लगेगा. पीने के पानी में बीओडी एक मिली ग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए. लेकिन, झारखंड की किसी भी नदी में बीओडी दो से नीचे नहीं है.
हरमू और स्वर्णरेखी नदी की जांच में पाया गया कि यहां 100 मिली लीटर में 1600 से अधिक बैक्टीरिया हैं. यह पीने के लिए काफी खतरनाक है. सामान्य गाइडलाइन यह है कि किसी भी तरह केे गंदा पानी में एक हजार से अधिक बैक्टीरिया 100 मिली लीटर पानी में नहीं होना चाहिए. इससे अधिक होने पर यह आसपास रहने वालों के लिए भी खतरनाक है. 2004 में भारत सरकार के नगर विकास विभाग ने एक कमेटी बनायी थी. कमेटी ने पानी में 500 एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर से अधिक कोलीफॉर्म को नुकसानदायक बताया था.
जांच में पाया गया कि उपरोक्त सभी नदी का पीएच सामान्य से अधिक है. आइएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक, जिस पानी का पीएच सात से अधिक होता है, वह पीने के लिए स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अच्छा नहीं होता है. पीएच लेवल सात हो जाने पर पीने के पानी का अम्ल और क्षार दोनों नष्ट हो जाता है. इससे अधिक पीएच लेवल का पानी शरीर को नुकसान पहुंचाता है.
यह सही है कि झारखंड की नदियों में प्रदूषण है. लेकिन, यहां की नदियां मौसम आधारित हैं. ज्यादातर नदियों में पानी तभी रहता है, जब बारिश होती है. कम बारिश होने पर नदियां सूख जाती हैं. जब नदियों में पानी नहीं होगा, तो प्रदूषण होगा. वैसे, हरमू और स्वर्णरेखा नदी में कोलीफॉर्म अधिक होने का कारण यहां मल-मूत्र का ज्यादा डिस्चार्ज होना है. इससे जल में बैक्टीरिया बढ़ता है, जो जलीय जीवों के लिए भी नुकसानदायक है.
आशीष शीतल, पर्यावरणविद, युगांतर भारती
Posted By: Sameer Oraon
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