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हम भारत की नारी हैं, फूल नहीं चिंगारी हैं, रांची में बोलीं पद्मश्री छुटनी देवी

Updated at : 13 Jan 2025 10:47 AM (IST)
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Chhutni Devi Jharkhand

डायन प्रथा के खिलाफ छुटनी देवी ने लंबे समय तक किया था संघर्ष.

Jharkhand News: डायन-बिसाही का दंश झेलने और उसके खिलाफ जंग छेड़ने वाली पद्मी छुटनी देवी ने कहा है कि हम भारत की नारी हैं, फूल नहीं चिंगारी हैं. उन्होंने झारखंड की महिलाओं से डायन प्रथा की रोकथाम के लिए आगे आने की अपील की है. उधर, डॉ रामदयाल मुंडा शोध संस्थान ने डायन प्रथा को रोकने के लिए शोध शुरू करने की घोषणा की है.

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Jharkhand News: अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नयी दिल्ली, झारखंड और रांची विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने मिलकर ‘इतिहास लेखन में महिला विमर्श’ विषय पर दो दिवसीय महिला इतिहासकार संगोष्ठी का आयोजन किया. संगोष्ठी का रविवार को समापन हो गया. इस संगोष्ठी में देश भर से आयी महिला शोधार्थियों ने 145 प्रपत्र प्रस्तुत किये. संगोष्ठी के दूसरे दिन 4 सत्रों में कुल 80 शोध पत्र प्रस्तुत किये गये. समापन समारोह में मुख्य अतिथि पद्मश्री छुटनी देवी ने कहा कि हम भारत की नारी हैं, फूल नहीं चिंगारी हैं. उन्होंने कहा कि महिला और पुरुष एक समान हैं. दोनों एक-दूसरे से कम नहीं हैं और दोनों का महत्व है. उन्होंने डायन प्रथा की रोकथाम के लिए महिलाओं से आगे आने की अपील की.

डायन प्रथा पर रोक के लिए झारखंड में होगा शोध

इधर, डायन प्रथा जैसी सामाजिक कुरीति को रोकने के लिए डायन प्रथा पर शोध कराने की घोषणा डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान ने की है. संस्थान ने कहा है कि डायन प्रथा झारखंड के लिए अभिशाप है. झारखंड के ग्रामीण क्षेत्र और खासकर आदिवासी समाज इस अंधविश्वास से प्रभावित हैं.

संपत्ति हड़पने के लिए महिलाओं को डायन बताकर मार डालते हैं

आये दिन डायन के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित कर उनकी हत्या होती रहती है. विधवा, निःसहाय महिला व वृद्धा की संपत्ति हड़पने, साजिश के तहत महिलाओं को प्रताड़ित करने या उसकी हत्या करने में इस कुप्रथा का सहारा लिया जाता है. डायन प्रथा के खिलाफ कानून बनने और जागरूकता अभियान चलाने के बाद भी न तो प्रताड़ना में कमी आयी है, न ही ऐसी घटनाओं पर अंकुश लग पाया है.

रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान ने की रिसर्च की तैयारी

डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान, (मोरहाबादी, रांची) ने डायन प्रथा पर शोध करने की तैयारी कर ली है. शोध का विषय ‘किस तरह डायन प्रथा की वजह से आदिवासी समाज का सामाजिक और आर्थिक तानाबाना बिखर रहा है’ होगा. सरकार से शोध की स्वीकृति मिल गयी है.

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अब तक के अध्ययनों में क्या पता चला?

अभी तक विभिन्न स्तरों पर जो शोध या अध्ययन हुए हैं, उसमें डायन प्रथा को आदिवासी समुदाय में मौजूद अंधविश्वास और अशिक्षा से जोड़कर देखा गया है. हालांकि, संस्थान के प्रारंभिक अध्ययन से पता चला है कि डायन प्रथा की वजह से पीड़ित परिवार या व्यक्ति के सामाजिक और आर्थिक जीवन पर बुरा असर पड़ता है. डायन करार देने के बाद पीड़ित व्यक्ति या परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है. इस कारण वह समाज और गांव से कट जाते हैं.

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शोध के परिणाम से डायन प्रथा पर अंकुश लगाने में मिलेगी मदद

ताजा शोध के जो परिणामों आयेंगे, उसकी मदद से सरकार को डायन प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए नीतियां बनाने में सहायता मिलेगी. यह भी जाना जा सकेगा कि डायन प्रथा पर अंकुश लगाने में अब तक के प्रयासों को और बेहतर कैसे किया जा सकता है.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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