झारखंड : मरीजों को भर्ती करने से पहले आने वाले खर्च की जानकारी नहीं देते कॉरपोरेट अस्पताल, IMA ने दी ये दलील
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 06 Nov 2023 7:36 AM
निजी और कॉरपोरेट अस्पताल में मरीजों को भर्ती करते समय ही 15,000 से 25,000 रुपये जमा करा लिये जाते है. वहीं, परिजनों को बताया जाता है कि जब पैसा खत्म होने लगेगा, तो आपको जानकारी दी जायेगी.
राजीव पांडेय, रांची : निजी व कॉरपोरेट अस्पताल (जो सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल होने का दावा करते हैं) में भर्ती होने से पहले मरीज व उनके परिजन को इलाज और सर्जरी में आनेवाले खर्च की जानकारी नहीं दी जाती है. कुछ अस्पताल आइसीयू, सामान्य वार्ड व डिलक्स कमरे और जांच में आनेवाले खर्च की जानकारी का बोर्ड टांग देते हैं. लेकिन कुल खर्च की जानकारी नहीं देते हैं. ऐसे में इलाज शुरू होने के बाद खर्च में बढ़ोतरी होने लगती है. परिजनों को अगले दिन 35,000 से 40,000 रुपये का बिल (एक दिन का) थमा दिया जाता है. ऐसे अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों को कई बार जमीन और गहने तक गिरवी रखने पड़ जाते हैं.
निजी और कॉरपोरेट अस्पताल में मरीजों को भर्ती करते समय ही 15,000 से 25,000 रुपये जमा करा लिये जाते है. वहीं, परिजनों को बताया जाता है कि जब पैसा खत्म होने लगेगा, तो आपको जानकारी दी जायेगी. कई अस्पताल तो चार्ट नहीं लगाते और जो लगाते हैं, उसमें केवल आइसीयू, वार्ड व कमरे के खर्च का उल्लेख किया जाता है. नियमानुसार अस्पतालों को एक-एक खर्च की जानकारी देनी है.
मरीजों को बताया जाता है कि आइसीयू व एचडीयू का चार्ज अलग है. सिंगल रूम, ट्वीन शेयरिंग और डिलक्स कमरा आप अपने हिसाब से चुन सकते हैं. इसमें डॉक्टर, नर्सिंग, पारा मेडिकल स्टाफ और दवाओं को चार्ज अलग से देना होगा. सामान्य वार्ड में अगर मरीज भर्ती हुआ, तो कमरे के नाम पर 1,500 से 2,000 रुपये और ट्वीन शेयरिंग में 2,500 से 3,500 रुपये, सिंगल रूम 3,500 से 4,000 रुपये लिये जाते हैं. डाॅक्टर का विजिटिंग चार्ज, नर्सिंग चार्ज, सर्जिकल आइटम का चार्ज जोड़कर 20,000 से 25,000 रुपये आ जाते हैं.
मरीज के परिजन को आइसीयू में रखने का खर्च अस्पताल द्वारा चार्ट में प्रतिदिन 5,500 से 8,000 बताया जाता है, लेकिन इसका कुल खर्च 35,000 से 40,000 रुपये तक पहुंच जाता है. यह इसलिए, क्योंकि इसमें डाॅक्टर का विजिटिंग जार्च, नर्सिंग चार्ज और सर्जिकल आइटम का चार्ज नहीं बताया जाता है.
राजधानी के एक निजी अस्पताल में मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने पर क्रिटिकल केयर में भर्ती करने की बात बतायी गयी. भर्ती करते समय मरीज से पहले 30,000 रुपये लिये गये. इसके बाद बताया गया कि आइसीयू का खर्च 8,000 रुपये है. इसके बाद अलग से खर्च लगेगा. सुबह मरीज को एक दिन के लिए 36,800 रुपये का बिल थमा दिया गया. मरीज को डिस्चार्ज होते वक्त तक 4,37,6000 रुपये का बिल भरना पड़ा.
कॉरपोरेट अस्पताल को छूट इसलिए है, क्योंकि मेडिकल प्रोटेक्टशन एक्ट राज्य में लागू नहीं है. अगर यह लागू होता, तो पूरी पारदर्शिता होती. अस्पतालों को इलाज का पूरा चार्ट टांगना पड़ता, जिसमें इलाज के एक-एक खर्च का उल्लेख होता. परिजन को लिखित रूप में बताना होता कि मरीज की स्थिति कैसी है. इससे मरीजों का दोहन नहीं हो पाता.
डॉ प्रदीप सिंह, सचिव स्टेट आइएमए
अस्पताल में भर्ती मरीजों के इलाज का खर्च सुनियोजित तरीके से बढ़ाया जाता है, जो डॉक्युमेंटेड होता है. इस पर परिजन चाह कर भी सवाल नहीं उठा सकते हैं. भर्ती मरीजों की जरूरत नहीं होने पर ब्लड सहित अन्य जांच करायी जाती है. डॉक्टर को भी पता होता है कि इतनी जल्दी-जल्दी जांच कराने का कोई लाभ नहीं होता है, लेकिन अस्पताल प्रबंधन के दबाव में वह ऐसा करते हैं. मरीज का एबीजी जांच दिनभर में तीन बार करायी जाती है.
एक बार जांच कराने का खर्च 2,000 रुपये होता है. यानी तीन बार एबीजी जांच कराने का खर्च 6,000 रुपये. अन्य ब्लड जांच में भी मरीज का 1,000 से 2,000 रुपये खर्च कराया जाता है. एंटीबायोटिक दवाओं पर भी 3,000 तक अतिरिक्त खर्च होता है. यही कारण है कि 5,500 से 8,000 रुपये आइसीयू बेड के चार्ज पर भर्ती मरीज का एक दिन का खर्च 35,000 से 40,000 रुपये पहुंच जाता है.
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