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जमीन से जुड़े मामले में वर्ष 1980 के अपीलीय कोर्ट के फैसले को तुरंत लागू करें : हाइकोर्ट

Updated at : 23 Mar 2024 12:23 AM (IST)
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जमीन से जुड़े मामले में वर्ष 1980 के अपीलीय कोर्ट के फैसले को तुरंत लागू करें : हाइकोर्ट

झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने भूमि विवाद से जुड़े मामले में दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दाैरान राज्य सरकार के अधिकारियों की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जतायी.

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वरीय संवाददाता, रांची झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने भूमि विवाद से जुड़े मामले में दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दाैरान राज्य सरकार के अधिकारियों की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जतायी. अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रार्थी एक गरीब व्यक्ति है, उसे अपने वैध अधिकार के लिए इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जिसकी मंजूरी सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में दी है. जहां अधिकार, शीर्षक, हित और कब्जा भी पहले ही घोषित किया जा चुका है. इसके बावजूद वर्ष 1980 के अपीलीय कोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया गया. अदालत ने राज्य सरकार को एक और अवसर देते हुए निर्देश दिया कि वह 1980 के अपील संख्या-14 में अपीलीय न्यायालय के निर्णय के पैराग्राफ-46 में दिये गये निर्देश को तुरंत लागू करे और तीन अप्रैल तक इस अदालत को रिपोर्ट करे. ऐसा नहीं करने पर मुख्य सचिव व राजस्व सचिव तीन अप्रैल को शाम 4.30 बजे अदालत में सशरीर उपस्थित रहेंगे, ताकि उनकी उपस्थिति में उचित आदेश पारित किया जा सके. इसके अलावा गुमला के रायडीह के सीओ श्रीकांत लाल माझी व बीडीओ बरकट्ठा (अंचलाधिकारी का अतिरिक्त प्रभार) रेशमा डुंगडुंग, जो आज उपस्थित हैं, आदेश पालन नहीं होने पर अगली सुनवाई में भी सशरीर उपस्थित रहेंगे. उल्लेखनीय है कि प्रार्थी सुरेंद्र प्रसाद चाैधरी ने याचिका दायर की है. अदालत ने कहा कि चार दशकों से अधिक पुराने एक मामले ने एक याचिकाकर्ता की दुर्दशा को उजागर किया है, जिसे भूमि विवाद के संबंध में अदालत के फैसले के फल से वंचित कर दिया गया. झारखंड हाइकोर्ट के नये भवन के उदघाटन के समय राष्ट्रपति द्राैपदी मुर्मू द्वारा आदेशों को लागू करने के मुद्दे पर उठायी गयी चिंताओं को जस्टिस आनंद सेन ने याद करते हुए डिक्री धारक के पक्ष में राजस्व रिकॉर्ड को संशोधित कर डिक्री को प्रभावी बनाने में राज्य की निष्क्रियता पर खेद व्यक्त किया. कहा कि लंबे वर्षों तक लड़ने के बाद एक मुकदमेबाज को राहत मिलती है. अपने पक्ष में डिक्री मिलने पर वह खुशी से भर जाता है, लेकिन, यह खुशी की मुस्कान कुछ ही वर्षों में निराशा में बदल जाती है और उसकी मुस्कुराहट गायब हो जाती है, क्योंकि उसे डिक्री का फल नहीं मिलता है. राज्य को राजस्व रिकॉर्ड को तुरंत सही करना चाहिए था. राज्य ने एक निजी वादी की तरह व्यवहार किया, जो अप्रत्याशित है.

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