पत्नी को नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकते : हाइकोर्ट

झारखंड हाइकोर्ट ने दांपत्य अधिकारों की बहाली से जुड़ी एक याचिका पर फैसला सुनाया है.
रांची. झारखंड हाइकोर्ट ने दांपत्य अधिकारों की बहाली से जुड़ी एक याचिका पर फैसला सुनाया है. इसमें स्पष्ट किया गया है कि पत्नी को अपनी नौकरी छोड़ कर पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है. नौकरी जारी रखना पति से अलग रहने का एक उचित और वैध कारण हो सकता है.
आदेश में हस्तक्षेप करने से किया इनकार
इस मामले की सुनवाई जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने की. खंडपीठ ने जितेंद्र आजाद की अपील याचिका पर फैसला सुनाते हुए पाकुड़ की फैमिली कोर्ट के 16 जून 2023 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. साथ ही संबंधित फैसले को सही ठहराया. पति की अपील याचिका भी खारिज कर दी. खंडपीठ ने कहा कि आधुनिक समाज में महिला को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहने का पूरा अधिकार है. पत्नी का नौकरी जारी रखना अनुचित आचरण नहीं माना जा सकता. दांपत्य अधिकारों की बहाली का अर्थ यह नहीं है कि पत्नी को जबरन पति की शर्तों पर जीने के लिए बाध्य किया जाये. विवाह एक साझेदारी है, जिसमें दोनों पक्षों को समझौता और संतुलन बनाना होता है. खंडपीठ ने यह भी कहा कि पति यह साबित करने में असफल रहा कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के अलग रह रही है.
यह था मामला
पति जितेंद्र आजाद ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा नौ के तहत अपनी पत्नी के खिलाफ दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की थी. उनका विवाह 12 मार्च 2018 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था. उनका आरोप था कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के उन्हें छोड़ कर अलग रह रही है. वहीं पत्नी ने अदालत को बताया कि उस पर सरकारी नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा था. पत्नी वर्तमान में पाकुड़ में सरकारी प्लस टू स्कूल में सहायक शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं.
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