बीएयू ने हाइकोर्ट के आदेश पर लगायी रोक, लीगल नोटिस मिला तो अधिसूचना रद्द की

Updated at : 11 May 2024 12:25 AM (IST)
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बीएयू ने हाइकोर्ट के आदेश पर लगायी रोक, लीगल नोटिस मिला तो अधिसूचना रद्द की

झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) प्रबंध पर्षद द्वारा रोक लगाने का मामला प्रकाश में आया है. जब इस मामले में विवि प्रशासन सहित पर्षद के सभी सदस्यों को लीगल नोटिस मिला, तो विवि को अपनी गलती का अहसास हुआ.

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रांची (संजीव सिंह). झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) प्रबंध पर्षद द्वारा रोक लगाने का मामला प्रकाश में आया है. जब इस मामले में विवि प्रशासन सहित पर्षद के सभी सदस्यों को लीगल नोटिस मिला, तो विवि को अपनी गलती का अहसास हुआ. फिर आनन-फानन में पर्षद के निर्णय को अधिसूचना जारी कर रद्द कर दिया गया. लेकिन इस चक्कर में वैज्ञानिकों को पिछले दो वर्ष से सेवानिवृत्ति लाभ सहित पेंशन तक नहीं मिल रही है. मामला बिरसा कृषि विवि (बीएयू) का है, जहां केवीके सरायकेला-खरसांवा की पूर्व वैज्ञानिक (होम साइंस) कंचन माला तथा केवीके पश्चिमी सिंहभूम के पूर्व वैज्ञानिक (एग्रोनॉमी) डॉ प्रमोद कुमार को वर्ष 2021 में 60 वर्ष में सेवानिवृत्त होने के बाद अब तक न तो सेवानिवृत्ति लाभ ही मिला है और न ही पेंशन ही शुरू हो सकी है.

केवीके से 60 वर्ष की उम्र में रिटायर हुए, तो गये कोर्ट

बताया जाता है कि वैज्ञानिक कंचन माला तथा डॉ प्रमोद कुमार की नियुक्ति बीएयू में हुई. फिर विवि प्रशासन ने इन्हें केवीके में स्थानांतरित कर दिया. जहां उन्हें 60 वर्ष की उम्र सीमा में सेवानिवृत्त होना पड़ा. इसके विरोध में दोनों वैज्ञानिकों ने झारखंड हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इस पर हाइकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर मुखोपाध्याय ने विवि को दोनों वैज्ञानिकों को यथाशीघ्र सेवानिवृत्ति लाभ देने और पेंशन आरंभ करने का निर्देश दिया.

102वीं प्रबंध पर्षद की बैठक में एजेंडा के रूप में शामिल

इधर, विवि प्रशासन ने हाइकोर्ट के आदेश को 30 मार्च 2024 को आयोजित विवि की 102वीं प्रबंध पर्षद की बैठक में एजेंडा के रूप में शामिल किया. बैठक में पर्षद ने हाइकोर्ट के आदेश पर ही रोक लगा दी. इस पर भुक्तभोगी की ओर से पर्षद के सभी सदस्यों को लीगल नोटिस भेज कर कहा गया कि हाइकोर्ट के आदेश को विवि कैसे रोक सकता है. लीगल नोटिस मिलने के बाद जब विवि प्रशासन को गलती का अहसास हुआ, तो उसने आनन-फानन में निर्णय को पर्षद की बैठक बुलाये बिना अपने ही स्तर से ऑफिस ऑर्डर निकाल कर रद्द कर दिया. साथ ही दोनों वैज्ञानिकों के सेवानिवृत्ति लाभ सहित पेंशन का मामला राज्य सरकार के पास भेज दिया, जहां संचिका पड़ी हुई है. फिलहाल दोनों वैज्ञानिकों को लगभग तीन वर्ष बाद भी न तो सेवानिवृत्ति लाभ मिल पाया है और न ही पेंशन ही शुरू हो सकी है.

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