पुराने स्वरूप में पेसा नियमावली की सहमति विधिसम्मत नहीं : शिल्पी

Updated at : 27 Apr 2024 11:28 PM (IST)
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मांडर विधायक और जनजातीय सलाहकार परिषद की सदस्य शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि जिस प्रकार से पी-पेसा नियमावली को सहमति दी गयी है और उनके द्वारा दर्ज करायी गयी आपत्ति एवं सुझाव को दरकिनार किये जाने के बाद उसे कैबिनेट में रखे जाने का प्रस्ताव है, वह पूरी तरीके से संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है.

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रांची. मांडर विधायक और जनजातीय सलाहकार परिषद की सदस्य शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि जिस प्रकार से पी-पेसा नियमावली को सहमति दी गयी है और उनके द्वारा दर्ज करायी गयी आपत्ति एवं सुझाव को दरकिनार किये जाने के बाद उसे कैबिनेट में रखे जाने का प्रस्ताव है, वह पूरी तरीके से संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है. श्रीमती तिर्की ने कहा कि नियमावली की मंजूरी के दौरान उनके सुझाव और आपत्तियों को बिना स्पष्टीकरण खारिज किया जाना, उनके विशेषाधिकार का हनन है और वह इस मामले पर विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखेंगी. उन्होंने कहा कि संबंधित विभाग से यह पूछा जाना चाहिए कि यदि राज्य में पी-पेसा नियमावली नहीं बनी है, तो किस आधार पर अनुसूचित क्षेत्रों में 2010, 2015 एवं 2022 में पंचायती राज चुनाव हुए या फिर 15वें वित्त आयोग या पहले के भी वित्त आयोगों द्वारा स्वीकृत धनराशि को अनुसूचित क्षेत्रों में खर्च किया गया. यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जनजातीय उप योजना एवं डीएमएफटी की राशि आखिर किस आधार पर अब तक खर्च की जाती रही है या फिर किस आधार पर अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन का अधिग्रहण किया गया तथा बालू घाटों की नीलामी की गयी? श्रीमती तिर्की ने कहा कि पी-पेसा कानून 1996 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस अधिनियम के सभी 23 प्रावधानों का जिक्र करते हुए विशेष रूप से अध्याय 10 के 4 (ओ) एवं 4 (एम) की भी चर्चा की है, जिसके आधार पर अनुसूचित क्षेत्र में स्वायत्त जिला परिषद और निचले स्तर पर परंपरागत ग्राम सभा स्थापित करने की संवैधानिक बाध्यता है. परंतु सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय का भी उपयुक्त पी-पेसा नियमावली में अनदेखी की गयी है. कहा कि संसद द्वारा मूल रूप से पी-पेसा कानून को अस्तित्व में इसीलिए लाया गया था, ताकि अनुसूचित क्षेत्र में रहनेवाले आदिवासियों एवं मूलवासियों की सुरक्षा के साथ-साथ, जल, जंगल, जमीन और यहां के खनिज संसाधनों की रक्षा हो सके. इसके साथ ही जनजातीय उप योजना और डीएमएफटी योजना की राशि के साथ समस्त अनुसूचित क्षेत्र में समुचित विकास हो सके. उन्होंने कहा कि यदि यह नियमावली पारित हो जाती है, तो अनुसूचित क्षेत्र में रहनेवाले लोगों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की बात पूरी तरीके से बेमानी होगी.

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