मां बगलामुखी की 41 दिन की विशेष पूजा से झारखंड की राजनीति में बढ़ा बाबूलाल मरांडी का कद!

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 15 Feb 2020 6:25 PM

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रांची : राजनीति में पूछ उसी की होती है, जिसके पास जनाधार होता है. जिसके पाले में सबसे ज्यादा विधायक और सांसद होते हैं. वह सरकार बनाने या गिराने का खेल करने में सक्षम होता है. बड़ी पार्टियों के साथ तभी वह मोल-भाव कर पाता है. लेकिन, झारखंड के एक ऐसे नेता, जिसने 14 साल […]

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रांची : राजनीति में पूछ उसी की होती है, जिसके पास जनाधार होता है. जिसके पाले में सबसे ज्यादा विधायक और सांसद होते हैं. वह सरकार बनाने या गिराने का खेल करने में सक्षम होता है. बड़ी पार्टियों के साथ तभी वह मोल-भाव कर पाता है. लेकिन, झारखंड के एक ऐसे नेता, जिसने 14 साल पहले राष्ट्रीय पार्टी से इस्तीफा देकर अपनी पार्टी बनायी और सत्ता के खेल में कभी शामिल नहीं हो पाया, आज दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की जरूरत बन गया है. इस नेता का नाम है बाबूलाल मरांडी. प्रदेश की राजनीति में मरांडी का कद बढ़ने के पीछे मां बगलामुखी की कृपा को माना जा रहा है.

बाबूलाल मरांडी ने एक वर्ष पहले जनवरी, 2019 में मकर संक्रांति के बाद रांची में अपने अरगोड़ा स्थित आवास पर विशेष पूजा का आयोजन किया था. 41 दिन की इस विशेष पूजा का ही असर है कि श्री मरांडी का कद प्रदेश की राजनीति में इतना बढ़ गया है. बाबूलाल मरांडी के लिए विशेष पूजा करने वाले रांची के जाने-माने पंडित और ज्योतिषाचार्य रामदेव पांडेय ने प्रभातखबर.कॉम (prabhatkhabar.com) को यह जानकारी दी. श्री पांडेय ने बताया कि गत वर्ष मकर संक्रांति के बाद जनवरी में उन्होंने श्री मरांडी के अरगोड़ा स्थित आवास पर मां बगलामुखी की विशेष पूजा की थी.

श्री पांडेय ने बताया कि जनवरी, 2019 में बाबूलाल मरांडी ने पूजा का संकल्प किया और मार्च में हवन के साथ इस विशेष अनुष्ठान का समापन हुआ. राजनीतिक व्यस्तताओं के कारण श्री मरांडी पूजा के दौरान पूर्णाहुति समेत सिर्फ 5 दिन हवन में शामिल हो पाये. पंडित रामदेव ने बताया कि बाबूलाल मरांडी के किसी करीबी पत्रकार ने उनसे विशेष अनुष्ठान करने का आग्रह किया था. कहा था कि उनकी सत्ता में वापसी के लिए वह विशेष आयोजन करें, ताकि श्री मरांडी एक बार फिर झारखंड के मुख्यमंत्री बन सकें.

पंडित रामदेव बताते हैं कि उन्होंने जनवरी, 2019 में संकल्प लिया और ईश्वर से प्रार्थना की कि उन्हें (बाबूलाल मरांडी को) राजनीति में वह कद दें, जिसके वह योग्य हैं. चुनाव के परिणाम आये, तो जेवीएम को सिर्फ 3 सीटें मिलीं. पंडित रामदेव को हताशा हुई. उन्हें लगा कि उनका अनुष्ठान नाकाम हो गया. लेकिन, चुनाव के ठीक बाद जब भारतीय जनता पार्टी में उनके शामिल होने की जानकारी उन्हें मिली, तो श्री पांडेय ने ईश्वर का धन्यवाद किया. श्री पांडेय कहते हैं कि सच्चे मन से यदि बगलामुखी की पूजा करेंगे, तो उसका असर दिखेगा. बड़े-बड़े राजनेता और व्यापारी जब मुश्किलों में घिर जाते हैं, तो मां बगलामुखी की शरण में जाते हैं.

श्री पांडेय ने यह भी बताया कि प्रदेश के कई नेताओं ने मां बगलामुखी की विशेष आराधना से सत्ता पायी है. झारखंड के तीन मुख्यमंत्री ऐसा कर चुके हैं. किसी ने रजरप्पा में पूजा करवायी, तो किसी ने कामाख्या में. बाबूलाल मरांडी ने रांची स्थित अपने आवास पर यह पूजा रखी. पंडित रामदेव पांडेय का दावा है कि 41 दिन की विशेष पूजा का ही फल है कि बाबूलाल मरांडी की भाजपा में वापसी हो रही है और उन्हें बड़ा पद मिलने जा रहा है. ज्ञात हो कि झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी सोमवार (17 फरवरी, 2020) को अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में विलय कर देंगे.

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ-साथ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा स्वयं बाबूलाल मरांडी की घर वापसी के लिए आयोजित कार्यक्रम ‘मिलन समारोह’ में शामिल होंगे. श्री पांडेय बताते हैं कि झारखंड के विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त झेलने के बावजूद प्रदेश की राजनीति में बाबूलाल मरांडी का कद बढ़ा है, तो यह मां बगलामुखी की कृपा ही है. सभी 81 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बाबूलाल की पार्टी जेवीएम के सिर्फ 3 उम्मीदवार ही विधानसभा पहुंच सके. विशेष अनुष्ठान के आयोजन के बारे में जानने के लिए हमने बाबूलाल मरांडी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे हमारी बात न हो सकी.

यहां बताना प्रासंगिक होगा कि देश भर में मां बगलामुखी के कई मंदिर हैं, लेकिन सिर्फ चार ही मंदिर ऐसे हैं, जिन्हें सिद्ध पीठ कहा जाता है. मध्यप्रदेश के नलखेड़ा में पांडवकालीन मंदिर है. यहां का पुजारी आदिवासी है. दूसरा मंदिर असम के कामाख्या में, तीसरा बिहार के गया जिला में मंगला गौरी मंदिर और चौथा मध्यप्रदेश के झांसी से सटे दतिया में. वर्ष 1962 में जब भारत पर चीन ने आक्रमण कर दिया था, उस वक्त इस मंदिर में विशेष पूजा की गयी थी. इस मंदिर की स्थापना नलखेड़ा के मुख्य पुजारी ने ही की थी.

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