झारखंड आंदोलन में गूंजते थे मधु मंसूरी हंसमुख के गीत
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Jan 2020 2:21 AM
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रांची : कभी झारखंड अलग राज्य आंदोलन में मधु मंसूरी हंसमुख का गीत गूंजा करता था. कहीं भी प्रदर्शन हो तो वह गीत गाकर आंदोलनकारियों को प्रेरित करते थे. झारखंड के अनेक अलबेले गायकों में नागपुरी गायक मधु मंसूरी हंसमुख का अपना जज्बा रहा है. सुरीली आवाज के धनी मधु मंसूरी केवल गीत ही नहीं […]
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रांची : कभी झारखंड अलग राज्य आंदोलन में मधु मंसूरी हंसमुख का गीत गूंजा करता था. कहीं भी प्रदर्शन हो तो वह गीत गाकर आंदोलनकारियों को प्रेरित करते थे. झारखंड के अनेक अलबेले गायकों में नागपुरी गायक मधु मंसूरी हंसमुख का अपना जज्बा रहा है.
सुरीली आवाज के धनी मधु मंसूरी केवल गीत ही नहीं गाते, बल्कि वह एक भावुक कवि भी हैं. झारखंड अलग राज्य आंदोलन में सर्वाधिक प्रेरक गीत गाने का रिकार्ड लोकप्रिय गायक मधु मंसूरी ने ही बटोरा है.
झारखंड आंदोलन के दौरान उनके गीतों से ही स्पष्ट हो जाता है कि झारखंड अलग राज्य के लिए आम झारखंडी किस तरह हर कुर्बानी देने के लिए हरदम तैयार रहा करते थे. आंदोलन के दौरान उनके गीत…. पहिले रहिली हम गोरा के धंगरवा, धन धरम डगमग, आबे ही साहेबक पानी भरवा.
(अरे! पहले तो हम गोरे अंग्रेजों के नौकर थे जिसके कारण हमारी समृद्धि और धर्म की कोई बिसात नहीं थी और, आज हम अपने देसी साहबों के यहां पानी भर रहे हैं). झारखंड के किसी भी आंदोलन में मधु मंसूरी के गाये ‘गांव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं, माई-माटी छोड़ब नाहीं’ गाना नारे की तरह इस्तेमाल होता है.
पूर्व में मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने जब अपने सभी विधायकों के साथ मुर्गा छाप वाली अपनी झारखंड पार्टी को कांग्रेस में मिला दिया था, तो उनपर कई सवाल उठे थे. मधु जी के मन में इसे लेकर आक्रोश था और एक दिन उन्होंने बिरसा चौक में आयोजित एक कार्यक्रम में मारंग गोमके के सामने ही गीत गाकर उनके फैसले पर विरोध जताया था.
मधु मंसूरी ने गीतों में झारखंड के दुख दर्द को बताने के लिए उसकी रचना की और उसे हर मंच पर गाया. वे जितना अच्छा गाते हैं उतना ही अच्छा मांदर बजाते हैं और झूमर खेलते हैं.
पूर्व सांसद डॉ रामदयाल मुंडा और पद्मश्री मुकुंद नायक के साथ मिलकर नागपुरी गीत संगीत व नृत्य को विदेशों में भी लोकप्रिय बनाया. आज के समय में सर्वाधिक लोकप्रिय गायक के रूप में मधु मंसूरी को जाना जाता है. इन्हें नागपुरी का राजकुमार भी कहा जाता है.
मेकन में 33 वर्षो तक नौकरी करने के बाद मधु मंसूरी ने 2002 में वीआरएस ले लिया. चार पुत्र और तीन पुत्री के भरे पूरे परिवार के साथ गायक मधु मंसूरी आज भी झारखंड के गीत गाने में ही आनंद का अनुभव करते हैं. उनके कंठ के सुरीलेपन से आज भी मधु झरता है. उनके नागपुरी गीत नागपुर कर कोरा आज यूट्यूब में धमाल मचा रहा है. 1972 में यह गीत श्री मंसूरी ने गाया था.
पहली बार विविध भारती पर नागपुरी गाना नागपुर कर कोरा ही बजा था. उनके गीत हक आपन मांग छोड़ न मैदान भी प्रसिद्ध है. पलायन पर एक गीत …चांदो रे ..चांदो रे …चांदो रे… चांदो रे… तोय कोरा मत जाबे चांदो हमर प्रेम तोड़ी… जाबे जहां कहां पाबे हीरा नागपुर आज भी प्रांसगिक है. झारखंड सरकार ने भी उन्हें झारखंड रत्न का सम्मान दिया था. आज भारत सरकार ने उनकी कला को पहचाना और उन्हें पद्मश्री के अवार्ड से नवाजा है.
मेरे लिए गौरव की बात : मेघनाथ
फिल्मकार मेघनाथ कहते हैं कि मधु मंसूरी को पद्मश्री मिलना मेरे लिए गौरव की बात है. मेरे लिये और भी गौरव की बात है कि गाड़ी लोहरदगा मेल के तीनों प्रसिद्ध व्यक्ति डॉ रामदयाल मुंडा, मुकुंद नायक और मधु मंसूरी को पद्मश्री अवार्ड मिल चुका है. मैने उस युग को जिया है. मैने इन तीनों से नागपुरी, खोरठा और मुंडारी संगीत सीखा था.
मधु मंसूरी का परिचय
जन्म: 1948
स्थान : सिमलिया, रातू रांची
पत्नी : सामिया उरांव
पिता : अब्दुल रहमान मंसूरी
व्यवसाय : गीतकार, लोक गायक, आंदोलनकारी
अवार्ड: झारखंड रत्न, झारखंड विभूति अवार्ड
रचनाएं : इनकी छोटी पुस्तिकाएं मधु मंजर समेत कई दर्जन गीत
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