देश ने सुनी ओरमांझी प्रखंड के आरा और केरम गांव की कहानी, नशा व खुले में शौच से हैं मुक्त, पेड़ काटने पर भी हैं पाबंदी

Updated at : 29 Jul 2019 9:08 AM (IST)
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देश ने सुनी ओरमांझी प्रखंड के आरा और केरम गांव की कहानी, नशा व खुले में शौच से हैं मुक्त, पेड़ काटने पर भी हैं पाबंदी

यहां बह रही है बदलाव की बयार : देश ने सुनी ओरमांझी प्रखंड के आरा और केरम गांव की कहानी प्रधानमंत्री की जुबानी प्रत्येक महीने के एक व 14 तारीख को गांव लोग करते हैं श्रमदान केरम गांव में न पेड़ काटना तो दूर पेड़ के पत्ते भी नहीं तोड़े जाते पौधरोपण के साथ-साथकी जाती […]

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यहां बह रही है बदलाव की बयार : देश ने सुनी ओरमांझी प्रखंड के आरा और केरम गांव की कहानी प्रधानमंत्री की जुबानी
प्रत्येक महीने के एक व 14 तारीख को गांव लोग करते हैं श्रमदान
केरम गांव में न पेड़ काटना तो दूर पेड़ के पत्ते भी नहीं तोड़े जाते
पौधरोपण के साथ-साथकी जाती है गांव व सड़कों की सफाई
संजय
रांची : नशा तथा खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हैं ओरमांझी प्रखंड की टुंडाहुली पंचायत के आरा और केरम गांव. यहां ग्रामीण अपने पशुअों को खुला नहीं छोड़ते. अौर हां, जंगल काटना ही नहीं, यहां पेड़ के पत्ते तोड़ना भी मना है.
इस तरह दोनों गांव नशा बंदी, लोटा बंदी, चराई बंदी व कुल्हाड़ी बंदी वाले हैं. यही इनकी सफलता का मूल मंत्र भी है. जलछाजन व जल संवर्द्धन के जरिये कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर इस गांव में मछली पालन की भी शुरुआत हुई है. लोगों की मेहनत तथा सरकार के सहयोग से दो साल में ही इन गांवों की तकदीर बदल गयी है.
प्रखंड चौक से चंदवे जानेवाली सड़क पर कुच्चू से पहले चार किलोमीटर अंदर जाने पर ये गांव मिलते हैं. आरा में करीब 80 घर है तथा केरम में 30 घर. करीब 550 लोग यहां रहते हैं. पहाड़ की तलहटी पर बसा केरम पूरी तरह जनजातीय (बेदिया) गांव है.
वहीं आरा में महतो और कुछ अन्य जातियां भी हैं. सिर्फ तीन साल पहले तक ये गांव झारखंड के अधिसंख्य गांवों की तरह ही थे. पर सार्थक प्रयास से यहां के हालात बदल गये हैं. पूरी तरह नशामुक्त दोनों गांव में भरपूर खेती होती है. मनरेगा के तहत गांव में कुल 42 डोभा बनाये गये. अब इनमें मछली पालन भी होता है.
गांवों के विकास में मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी की अहम भूमिका
पहाड़ की तलहटी में बसे इन गांवों के विकास में आइएफएस अधिकारी तथा वर्तमान में मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी की अहम भूमिका है .
इस शख्स ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ सरकारी योजनाओं के माध्यम से इन गांवों की तसवीर बदल दी है. केरम के ग्राम प्रधान रामेश्वर बेदिया ने बताया कि वन आधारित जीविकोपार्जन वाले इस गांव में आज न कोई पेड़ काटे जाते हैं और न ही पत्ते तोड़े जाते हैं. अप्रैल 2014 में गांव में जंगल बचाने के लिए वन रक्षा बंधन कार्यक्रम आयोजित हुआ था. सिद्धार्थ इसमें मुख्य अतिथि थे.
इस कार्यक्रम के कुछ माह बाद वह फिर गांव आये तथा ग्रामीणों के साथ बैठक की. किसी ने कहा कि यहां दो-तीन घर छोड़ हर घर में शराब का सेवन होता है. इसके बाद सबसे पहले गांव में नशामुक्ति अभियान चलाया गया. नौजवानों ने शपथ ली कि वे शराब का सेवन नहीं करेंगे. पर बदलाव की असली बयार तो अन्ना हजारे के गांव रालेगन सिद्दि की यात्रा के बाद ही बही.
जनवरी 2017 में आरा व केरम के 35 ग्रामीणों ने रालेगन सिद्धि का भ्रमण किया था. सरकार ने इसकी व्यवस्था की थी. बकौल रामेश्वर इस यात्रा ने हम सबकी आंखें खोल दी. इसी के बाद से इन गांवों में स्वच्छता, नशामुक्ति, बेहतर खेती व श्रमदान ने जोर पकड़ा. आरा व केरम के ग्रामीण हर माह की एक व 14 तारीख को अपने गांव व सड़कों की साफ-सफाई, पौधरोपण, पौधों की देखभाल व अन्य सार्वजनिक काम श्रमदान के जरिये करते हैं.
आय का स्रोत बनी ड्रिप इरिगेशन आधारित खेती
अारा-केरम में वर्ष 2018 से ड्रिप इरिगेशन आधारित खेती शुरू हुई. खेतों में टमाटर, शिमला मिर्च व दूसरी सब्जियां लगती है. करीब पांच डिसमिल जमीन पर शिमला मिर्च की खेती से गांव के रामदास महतो को डेढ़ लाख रुपये की आय हुई थी.
अब इस वर्ष ग्रामीणों ने यहां पांच लाख के तरबूज का उत्पादन किया है. शिमला मिर्च से तीन लाख कमाये हैं. पशुपालन से 15-20 लाख की आय हुई है. दरअसल इस गांव में बेहतरी के दूसरे उदाहरण भी हैं. सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई पंप व पैक हाउस (छोटे गोदाम कह लें) भी हैं यहां. ग्रामीण विकास के आजीविका मिशन के सात महिला स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक ताकत दे रहा है. पूरे गांव में गाय व बकरी पालन के करीब 150 शेड मिलने की खुशी भी यहां पसरी दिखायी देती है. बहरहाल, आगे बढ़ने की मानसिकता व खुशी के साथ-साथ आरा व केरम के ग्रामीणों में वह तहजीब भी है, जो यहां पहुंचे हर शख्स को प्रणाम सर के रूप में सुनायी देती है.
गांव में मनरेगा के तहत हुए हैं कई काम
पीएम की बात सुन उत्साहित हैं गांव के लोग
पीएम के मन की बात से हमें बहुत खुशी हुई. गांव में जो कुछ हुआ, वह ग्रामीणों के अथक प्रयास का नतीजा है. सरकार का सहयोग तथा मनरेगा आयुक्त का मार्गदर्शन भी अहम है. हमारा मानना है कि दूसरे गांव के लोग भी ऐसे प्रयास करें, तभी जीने-खाने के लिए पानी रोकने का सपना पूरा होगा.
रामेश्वर बेदिया, ग्राम प्रधान केरम.
प्रधानमंत्री की मन की बात सुन कर पूरा गांव उत्साहित है. करीब डेढ़ सौ ग्रामीणों ने मिल कर डोंभा झरना पर करीब 700 बोल्डर स्ट्रक्चर बनाया है. मनरेगा से गांव में बहुत काम हुए हैं. मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी जी से हमलोगों को सहयोग व मार्गदर्शन मिलता रहता है.
गोपाल राम बेदिया, ग्राम प्रधान अारा.
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