अखंडता के लिए यादगार शहादत

Updated at : 23 Jun 2014 5:58 AM (IST)
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अखंडता के लिए यादगार शहादत

23 जून : डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस विनय कुमार सिंह 23 जून 1953 को आज ही के दिन भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर में मातृभूमि के लिए बलिदान हो गये थे. स्वतंत्र भारत की एकता एवं अखंडता के लिए यह पहली शहादत थी. डॉ मुखर्जी का वह अमर […]

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23 जून : डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस

विनय कुमार सिंह

23 जून 1953 को आज ही के दिन भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर में मातृभूमि के लिए बलिदान हो गये थे. स्वतंत्र भारत की एकता एवं अखंडता के लिए यह पहली शहादत थी. डॉ मुखर्जी का वह अमर बलिदान इतिहास के पन्ने में स्वर्णाक्षरों में अंकित है.

26 अक्तबूर 1947 को जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने रियासत का विलय भारतीय संघ में कर दिया और यह प्रदेश भारत का अभिन्न अंग हो गया. 1951 में राज्य विधानसभा के पहले चुनाव के परिणामस्वरूप राज्य के शासन की बागडोर शेख अब्दुल्ला के हाथों में आ गयी.

उस समय जम्मू-कश्मीर में अलग निशान (झंडा), अलग विधान व अलग प्रधान (भारत के समानांतर एक अलग प्रधानमंत्री) का प्रचलन था. शेख साहब शान से कश्मीर के ‘वजीरे आजम’ (प्रधानमंत्री) कहलाते थे. जो भी देशभक्त नागरिक वहां राष्ट्रीय तिरंगा फहराने की कोशिश करते, वे अब्दुल्लाशाही की गोलियों से उड़ा दिये जाते. इतना ही नहीं, देश के अन्य भाग के लोगों को जम्मू-कश्मीर जाने के लिए ‘परमिट’ लेना पड़ता था. साफ है कि यह सब भारतीय संविधान की मूल भावना ‘एक राष्ट्र, एक जन’ के खिलाफ था.

जम्मू-कश्मीर ‘अलग निशान, अलग विधान, अलग प्रधान’ तथा शेष भारत के लोगों के लिए राज्य में प्रवेश के लिए परमिट प्रणाली के कुचक्र में फंस कर भारत-द्रोहियों व पृथकतावादियों का अभयारण्य बन रहा था. उसी समय राज्य में देशभक्त नेता पं प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में प्रजा परिषद ने कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय को राज्य विधानसभा में पारित कराने के पक्ष में जोरदार आंदोलन छेड़ दिया.

इस पर शेख की सरकार ने प्रजा परिषद के देशभक्तों पर क्रूर दमनचक्र चलाना प्रारंभ कर दिया, जिसमें दर्जनों शहीद हुए और सैकड़ों जेलों में यातना सहने को डाल दिये गये.

सन् 1952 के मध्य में भारतीय संसद में प्रखर सांसद डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के देशभक्तों पर चलाये जा रहे दमनचक्र के खिलाफ जोरदार आवाज उठायी, लेकिन प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू ने प्रजा परिषद, जनसंघ और डॉ मुखर्जी को सांप्रदायिक करार दिया. तब भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष डॉ मुखर्जी ने दिसंबर 1952 में पार्टी के कानपुर अधिवेशन के मंच से प्रजा परिषद के देशभक्तों के आंदोलन को समर्थन की घोषणा कर दी. उन्होंने अनुचित, भेदभावपूर्ण व देशघाती परमिट प्रणाली को तोड़ कर जम्मू-कश्मीर जाने की भी घोषणा कर दी. जनसंघ का आंदोलन जोर पकड़ने लगा.

8 मई 1953 को डॉ श्यामा मुखर्जी, वैद्य गुरुदत्त, पं टेकचंद्र शर्मा, पं प्रेमनाथ डोगरा, प्रो बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी सहित आठ साथियों के साथ नयी दिल्ली से जम्मू के लिए रवाना हुए. रास्ते में प्रत्येक स्टेशन पर हजारों की भीड़ ने उनका अभिनंदन किया. 11 मई 1953 को डॉ मुखर्जी ने रावी नदी के ऊपर माधोपुर चेकपोस्ट पर परमिट प्रणाली को तोड़ कर ‘एक देश में दो निशान, दो विधान, दो प्रधान नहीं चलेंगे’ के गगनभेदी नारे के साथ जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवेश किया.

वे गिरफ्तार कर श्रीनगर के सरकारी जेल में रखे गये. जेल में उनके साथ वैद्य गुरुदत्त, पं टेकचंद्र शर्मा एवं पं प्रेमनाथ डोगरा थे. जेल में ही 23 जून 1953 की रात रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया. डॉ मुखर्जी के बलिदान से वहां ‘अलग प्रधान’ की व्यवस्था खत्म हो गयी. तिरंगा शान से लहराना संभव हुआ. लेकिन सर्वनाश की जड़ धारा 370 के रूप में ‘अलग विधान’ आज भी जारी है. अमर शहीद डॉ मुखर्जी को शत्-शत् नमन!

(लेखक झारखंड भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य हैं)

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