झारखंड में हर वर्ष जन्म के पहले माह में ही हो जाती है 17500 नवजात की मौत
Updated at : 19 Nov 2018 7:42 AM (IST)
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रांची : दुनिया भर में नवजात सप्ताह 15 से 21 नवंबर के बीच आयोजित होता है. यह एक महत्वपूर्ण वैश्विक अवसर है, जो नवजात (नियोनेटल) के जीवन व उनके विकास के महत्व पर केंद्रित होता है. जन्म से लेकर 28 दिन तक के बच्चे को नवजात कहते हैं. इस वर्ष नवजात सप्ताह का थीम है- […]
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रांची : दुनिया भर में नवजात सप्ताह 15 से 21 नवंबर के बीच आयोजित होता है. यह एक महत्वपूर्ण वैश्विक अवसर है, जो नवजात (नियोनेटल) के जीवन व उनके विकास के महत्व पर केंद्रित होता है.
जन्म से लेकर 28 दिन तक के बच्चे को नवजात कहते हैं. इस वर्ष नवजात सप्ताह का थीम है- प्रीटर्म बर्थ: सर्वाइव एंड थ्राइव. यह थीम समय पूर्व व अर्द्ध विकसित पैदा होनेवाले बच्चों की समस्याओं से संबंधित है. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में हर वर्ष 26 लाख नवजात की मौत जन्म के पहले महीने में ही हो जाती है. वहीं झारखंड में हर वर्ष जन्म के पहले माह में मरने वाले नवजात की संख्या 17500 है. इनमें समय पूर्व पैदा होने वाले बच्चे भी शामिल हैं.
सात वर्षों में बचायी गयी 6000 नवजात की जान : यूनिसेफ का मानना है कि यदि समय पर बीमारी के लक्षणों की पहचान कर ली जाये तथा जन्म के समय रेफरल और उचित देखभाल की सुविधा उपलब्ध हो, तो करीब 41 फीसदी नवजात की मौत रोकी जा सकती है.
एसआरएस के आंकड़े के अनुसार झारखंड में वर्ष 2011 से अब तक करीब छह हजार नवजात की जान बचायी गयी है. राज्य के जिला अस्पतालों व मेडिकल कॉलेजों में 18 विशेष नवजात देखभाल इकाई (एसएनसीयू) स्थापित हैं. सरकारी आंकड़े के अनुसार इन केंद्रों में अप्रैल से अक्तूबर 2018 के दौरान चार हजार से अधिक नवजात भर्ती कराये गये. इनमें से 60 फीसदी को उपचार के बाद एसएनसीयू से छुट्टी दी गयी. ऐसे बच्चों को उनके घर पर भी सहिया और एएनएम की देखभाल सुविधा प्रदान की गयी.
सहिया व एएनएम के माध्यम से नवजात की आवश्यक देखभाल सुनिश्चित करने से मौत कम की जा सकती है. इसके अलावा कंगारू मदर केयर जैसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप, जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान, भोजन से पहले तथा शौच के बाद साबुन से हाथ धोना, बीमार नवजात बच्चों की पहचान तथा कार्यरत कंगारू मदर केयर केंद्रों तथा विशेष नवजात देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में उनके रेफर की व्यवस्था से भी झारखंड में नवजात शिशुओं की मौत कम की जा सकती है.
डॉ मधुलिका जोनाथन, यूनिसेफ झारखंड प्रमुख
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