रांची : बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने तीसी की दो किस्में विकसित की
Updated at : 14 Oct 2018 6:29 AM (IST)
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रांची : बिरसा कृषि विवि द्वारा उत्पादित तीसी की दो किस्म दिव्या व प्रियम काफी लाभकारी साबित हो रही हैं. विवि के कुलपति डॉ पी कौशल ने बताया है कि बहुअायामी औषधीय गुणों वाली तीसी की देश एवं विदेश में ज्यादा मांग एवं बेहतर मूल्य को देखते हुए इसकी खेती में निर्यात की काफी संभावनाएं […]
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रांची : बिरसा कृषि विवि द्वारा उत्पादित तीसी की दो किस्म दिव्या व प्रियम काफी लाभकारी साबित हो रही हैं. विवि के कुलपति डॉ पी कौशल ने बताया है कि बहुअायामी औषधीय गुणों वाली तीसी की देश एवं विदेश में ज्यादा मांग एवं बेहतर मूल्य को देखते हुए इसकी खेती में निर्यात की काफी संभावनाएं बढ़ी हैं. राज्य के किसानों की आय दुगुनी करने में यह फसल सहायक साबित होगी. विवि के वैज्ञानिक तीसी अनुसंधान के साथ किसानों के खेतों तक तकनीकी हस्तांतरण में लगातार प्रयास कर रहे हैं.
राज्य में इसकी खेती का उपयुक्त समय 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक है. सिंचाई की कमी की अवस्था में धान की खड़ी फसल पकने के समय खेत में तीसी बीज का छिड़काव किया जाता है. जिसे पैरा या उटेरा खेती तकनीक कहते हैं.
कुलपति ने बताया कि विवि द्वारा विकसित एवं अनुशंसित दो किस्में – दिव्या (सिंचित) और प्रियम (असिंचित) के अलावा शेखर (सिंचित) किस्मों की खेती को लाभप्रद पाया गया है. 125 से 130 दिनों में तैयार होने वाली इन किस्मों से 35 से 41 प्रतिशत तक तेल की मात्रा पायी जाती है. दिव्या और प्रियम की उपज क्षमता 12-16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की अपेक्षा शेखर किस्म से सात से नौ क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है.
डॉ डीएन सिंह व डॉ सोहन राम ने बताया है कि तीसी के तेल के अलावा इसके तने से प्राप्त रेशे से विभिन्न उत्पाद का निर्माण, इसकी खली को गाय के चारे में उपयोग और खली की छोटी गोली बनाकर मुर्गी के बच्चे को खिलाया जाता है.
इसमें 20 प्रतिशत प्रोटीन, 37 प्रतिशत वसा और 28 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है. इसमें मौजूद ओमेगा-तीन की भरपूर मात्रा कोलेस्ट्रोल, हृदय एवं गठिया रोग में लाभदायक होता है. इसमें पाया जानेवाला लीग्नेन नामक तत्व कैंसर अवरोधी होता है.
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