रांची के रिम्स ऑडिटोरियम में जीवंत हुए चाणक्य कहा, "राष्ट्र से अधिक महत्व की कोई नीति नहीं होती"

रांची : पद्मश्री मनोज जोशी की प्रस्तुति "चाणक्य" का मंचन रिम्स ऑडिटोरियम में किया गया. "चाणक्य " मंचन का पहला दृश्य था, आचार्य चाणक्य के तक्षशिला छोड़कर पुरु नगर आ जाना .पहले ही दृश्य में चाणक्य के विचार और राष्ट्र को लेकर उनकी परिकल्पना जाहिर होती है. चाणक्य गांधार राजा आभी के यूनानी शासक अलिखसुंदर […]
रांची : पद्मश्री मनोज जोशी की प्रस्तुति "चाणक्य" का मंचन रिम्स ऑडिटोरियम में किया गया. "चाणक्य " मंचन का पहला दृश्य था, आचार्य चाणक्य के तक्षशिला छोड़कर पुरु नगर आ जाना .पहले ही दृश्य में चाणक्य के विचार और राष्ट्र को लेकर उनकी परिकल्पना जाहिर होती है. चाणक्य गांधार राजा आभी के यूनानी शासक अलिखसुंदर (अलेकजेंडर) से संधि करने के फैसले से नाराज थे. मंच पर निभाये जा रहे किरदार और उनके संवाद इतने प्रभावी थे कि इतिहास के उस काल खंड को सभी कलाकारों ने मिलकर उसे मंच पर जीवंत कर दिया.
सेवा फाउडेशन का आभार व्यक्त करते हुए मनोज जोशी ने कहा, हमें झारखंड में मौका मिला है इसके लिए हम इस संस्था का आभार व्यक्त करते हैं. इस संस्था के प्रदीप जी महाराज वंचितों के लिए काम कर रहे हैं . उन्होंने जब मुझसे यह बात कही, तो मैं जुड़ा और मुझे आपके बीच आने का मौका मिला.
जब वह मगध पहुंचे. मगध में सत्ता संघर्ष से परेशान चंद्रगुप्त जो दासी मूरा के पुत्र थे उन्हें साथ लिया. गंगा व यमुना के बीच निवास करने वाले शोषित आदिवासियों को एकजुट कर काशी, कौशल व मगध जैसे राज्यों पर विजय प्राप्त कर अखंड भारत की स्थापना की. इस छोटी सी कहानी को लगभग ढाई घंटे में बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया. मंच पर मौजूद एक – एक कलाकार से दर्शक अपना जुड़ाव महसूस कर रहे थे. संवाद और स्टेज पर हो रहे मंचन से दर्शक अपनी निगाहें नहीं हटा पा रहे थे.
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