करमा आज, थिरक उठे पांव, दमक उठे चेहरे, गीत, बांसुरी, फूल और सौंदर्य का है यह पर्व
Updated at : 20 Sep 2018 8:02 AM (IST)
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आज मनाया जायेगा प्रकृति पर्व करम रांची : प्रकृति पर्व करम आज मनाया जायेगा. रांची अौर आसपास के इलाके में पूजा की तैयारियां पूरी हो चुकी है. अच्छी फसल अौर खुशहाली के लिए लोग करमदेव की आराधना करते हैं. वहीं बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं. यह पर्व गीतों का, बांसुरी […]
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आज मनाया जायेगा प्रकृति पर्व करम
रांची : प्रकृति पर्व करम आज मनाया जायेगा. रांची अौर आसपास के इलाके में पूजा की तैयारियां पूरी हो चुकी है. अच्छी फसल अौर खुशहाली के लिए लोग करमदेव की आराधना करते हैं. वहीं बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं. यह पर्व गीतों का, बांसुरी और फूलों का है. इसे सौंदर्य का भी त्योहार माना जाता है. करम पर्व पर करम की डाली को अखड़ा में गाड़ा जाता है. परिवार अौर गांव की खुशहाली के लिए प्रार्थना की जाती है.
प्रकृति से जितना जुड़ेंगे खतरा उतना कम होगा
डॉ त्रिवेणी नाथ साहू, विभागाध्यक्ष, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग
हम प्रकृति के पुजारी है़ं करम पर्व पर हम करम की डाली को अखड़ा में सम्मानपूर्वक गाड़ते है़ं उसकी पूजा-अर्चना करते है़ं इस पूजा-अर्चना में कई तरह की कथाएं है़ं हम इसे भाई-बहन का त्योहार मानते है़ं पाप पर पुण्य का विजय भी मानते है़ं कई तरह की कथाएं हैं, पर मूलभूत बात यही है कि हम प्रकृति के सान्निध्य में जीवन जीते है़ं आज पूरी दुनिया पर्यावरण बचाने के उपाय खोज रही है, पर हमारे पुरखों ने इसे पहले ही पहचाना़ वे प्रकृति के साथ जुड़े रहे, निरोग रहे, प्रकृति उनका संसाधन रहा और वे प्रकृति की गोद में पले-बढ़े़ आज झारखंडी संस्कृति पूरी दुनिया को यह रास्ता दिखाती है कि आप प्रकृति से जितना जुड़े रहेंगे, इसका संरक्षण-संवर्द्धन करेंगे, तो आप पर खतरा उतना ही कम होगा़ डाॅ रामदयाल मुंडा ने भी कहा है कि जे नांची से बांची़ यह पर्व गीतों का, बांसुरी, फूलों का त्योहार है़
सौंदर्य का त्योहार है़ जो इस संस्कृति से जुड़ा रहेगा, वही बचेगा़ हमारी जो नाचने गाने की परंपराएं, राग, लय, छंद हैं, वह दुनिया में और कहीं देखने को नहीं मिलती. हमारे अखड़ा में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, मालिक-नौकर सभी लोग एक साथ नाचते-गाते है़ं कहीं कोई असमानता नहीं दिखती़ दिन भर जो श्रमदान करते हैं, उसकी परिपूर्णता इसी से करते है़ं यह उत्सव पूरी दुनिया को एक दिशा दिखा सकता है़
कर्म व धर्म को संतुलित कर चलना होगा
डॉ हरि उरांव,
सहायक प्राध्यापक, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग
करम पर्व झारखंड का लोकपर्व है़ पूरा झारखंडी समुदाय इसे कई अर्थ में मनाता है़ एक अर्थ यह कि कुंवारी लड़कियां इस त्याेहार में उपवास रख कर ईश्वर से अपने भविष्य की मंगलकामना करती हैं कि उन्हें अच्छा वर मिले़ उनकी संतान बलवान व बुद्धिमान हो़ दूसरा अर्थ यह कि जीवन में जितना स्थान कर्म का है, उतना ही धर्म का भी है़
इसलिए जीवन में कर्म और धर्म को संतुलित कर चलना होगा़ इसे अपने जीवन के आचरण में लाना होगा़ तीसरा यह कि हमारे पुरखों ने वृक्ष को प्रकृति के प्रतीक के रूप में देखा़ पर्यावरण संतुलन के प्रति सचेत रहे़ हर साल जब हम इसे मनायें, तब इस बात की चिंता करें कि कहीं पर्यावरण प्रदूषित तो नहीं हो रहा है? हमारे मानव जीवन में सहयोग करनेवाली प्रकृति में किसी तरह की खराबी तो नहीं आ रही? पर्यावरण शुद्ध रहे इसलिए आदिवासी एक प्रतीक के रूप में करम डाली की स्थापना कर पूजा करते है़ं
बताते हैं कि पर्यावरण के बारे में इसी चिंतना धारा के साथ वे यह पर्व मनाते है़ं आज कई विद्धान इस पर्व का गूढ़ समझने के लिए इस त्योहार में सम्मिलित होकर यह समझने का प्रयास करते कि पर्यावरण के बारे में हमारे पुरखों ने क्या कहा और क्या सोचा किस रूप में इसे देखा है? उस गूढ़ को समझने का प्रयास अब भी चल रहा है़
धर्म ही कर्म है कर्म ही धर्म है
डाॅ उमेश नंद तिवारी, सहायक प्राध्यापक जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग
हमारे जितने भी पर्व-त्योहार हैं, कमोबेश सभी प्रकृति से जुड़े है़ं इसी क्रम में हम करम भी मनाते है़ं करम, जितिया आदि पर्व झारखंड की परंपरा के जीवंत प्रतीक है़ं जब भरपूर बारिश होती है, किसान खुशी महसूस करते हैं, खेतों में फसल को बढ़ता देखते हैं, फसल की रक्षा की चिंता करते हैं, पर्यावरण की चिंता करते हैं. साथ ही खुशी भी मनाते है़ं कहीं धर्म की प्रधानता होती है, तो कहीं कर्म की़ पश्चिमी देशों में तो सिर्फ कर्म की प्रधानता है, धर्म कहीं नहीं है़ कहीं-कहीं सिर्फ धर्म की प्रधानता है़ जब तक जीवन में धर्म और कर्म का समन्वय न हो, तब तक जीवन सुखी, सही और संतुलित नहीं होता़
अापको इन सब चीजों को देखना- समझना है, तो झारखंड के पर्व-त्योहार देखे़ं धर्म और कर्म का समन्वय, प्रकृति का संतुलन ये सारे कुछ हमारे करम पर्व का प्रतिनिधत्व करते है़ं जिस बात को कहने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पूरी गीता कही, उसे यहां के सामान्य मानव ने सहज रूप में कह दिया कि धर्म और कर्म एक साथ चलेगा़ धर्म ही कर्म है और कर्म ही धर्म है़ अच्छी फसल अौर खुशहाली के लिए आदिवासी करमदेव की आराधना करते हैं. बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं. इस त्योहार में कहीं कोई असमानता नहीं दिखती है.
जिंदगी का असली
मंत्र मनुष्य के कर्म में
सरन उरांव,
कुड़ुख भाषा, व्याकरण, लाेक साहित्य के विद्वान
यहां के आदिवासियों के बीच करम का कितना महत्वपूर्ण स्थान है, वह करम के दिन देखने को मिलता है़ करम ही यहां की जिंदगी है़ करम कभी पुराना नहीं होता, न ही करम का फल कभी मिटता है़ कर्म ही मानव का असली धर्म है़ जिंदगी का असली मंत्र मनुष्य के कर्म में है़
भारत एक धर्म प्रधान देश है, जहां कर्म के साथ धर्म का मेल है़ करम पर्व में हर कुंवारी बहन अपने भाई के राज में अच्छी बारिश, अन्न-धन और सुख, शांति, समृद्धि के लिए उपवास व्रत रखती है़
करम की कहानी में बुराई पर अच्छाई की जीत की शिक्षा मिलती है़ उसके आधार पर विश्वास करते हैं कि हम अगर अच्छा काम करेंगे, तो अच्छा फल मिलेगा और बुरा करेंगे, तो उसका परिणाम भी बुरा ही होगा़ यहां के मूलवासी सदान भी करम को धूमधाम से मनाते है़ं
इस समय सबसे दुख की बात है कि अाधुनिकता की दौड़ में हम अपनी भाषा, संस्कृति व परंपराओं से, पूर्वजों द्वारा पर्व त्योहार मनाने के नेग दस्तूर, पूजा पाठ और गीत नाच से दूर हो रहे है़ं इतना ही नहीं हाथों से जल, जंगल, जमीन भी तेजी से निकलता जा रहा है़ भाषा-संस्कृति, वेश भूषा उसकी गति से मिट रही है़ं इन्हें आखिर बचाया कैसे जाये? हमें अपने समाज, धर्म और संस्कृति के प्रति अच्छे विचारों की सरिता प्रवाहित करने की आवश्यकता है़
आदिवासी दर्शन की वैज्ञानिकता
निंरजना हेरेंज टोप्पो, जय आदिवासी केंद्रीय परिषद की महिला प्रदेश अध्यक्ष
करम महोत्सव प्रकृति से जुड़ी हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य अंग है़ आदिवासी समुदाय के पुरखों ने भाई-बहनों के प्रेम और फसलों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से करम राजा को आराध्य देव चुना़ इसकी कथा में करमा व धरमा नाम के दो भाइयों को कर्म और धर्म का प्रतीक माना गया है़ इस पर्व के धार्मिक और सामाजिक दर्शन दोनों हैं, जो एक-दूसरे के पूरक है़ं यह महापर्व आदिवासी धर्म को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्कृष्ट भी साबित करता है़ जिस दर्शन पर आदिवासियों ने अपना विश्वास, आस्था बना कर रखा है उसे कोई सहजता से नकार नहीं सकता़ करम की गाथा के बिना मनुष्य के मूल जीवन दर्शन की कल्पना करना अधूरा है़ वर्तमान समय में हम करम परब को पर्यावरण की रक्षा, मानव के जीवन दर्शन व मूल्यों की रक्षा और विश्व बंंधुत्व के संदर्भ में देख सकते है़ं
खुशहाली की कामना
अरुण अमित तिग्गा, सहायक प्राध्यापक जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग
करम प्रकृति का पर्व है़ इसके माध्यम से बहन- भाई का प्रेम दर्शाया जाता है़ बहन अपने भाई के लिए प्रार्थना करती है कि वह दीर्घायु हो, उसका प्रगति हो और उसके जीवन में अमन-चैन-सुख की हरियाली छायी रहे़ यह आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण त्योहार है़ प्रकृति व मानव को जोड़ कर हम इसे प्रदर्शित करते है़ं
पाहनों ने कहा
अखड़ा को पुनर्जीवित करना होगा
पूजा के दौरान करम डाल लाने का काम नवयुवक करते हैं. डाल का स्वागत युवतियां करती हैं. इन सारी चीजों में विधि-विधान का पालन होता है. पर आज की नयी पीढ़ी पूजा की विधियों को उतना नहीं समझती है. उन्हें करम गीतों के अर्थ को भी समझना होगा. पारंपरिक वाद्य यंत्रों के बारे में भी जानना होगा. अखड़ा को पुनर्जीवित करना जरूरी है. युवा डीजे पर तो थिरक लेते हैं पर पारंपरिक गीतों में जो बात है उसके महत्व को नहीं समझ पाते. यहां पर उन्हें प्रोत्साहित करना जरूरी है.
जगलाल पाहन, हातमा
विधि-विधान को नहीं समझते हैं युवा
करम पर्व सरना धर्मावलंबियों का महत्वपूर्ण त्योहार है. इसमें उपवास रखने वाले कुंआरे लड़के करम डाल लाने जाते हैं जबकि लड़कियां उसका स्वागत करती हैं. डाल को स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है. कथा होती है. पारंपरिक गीत गाये जाते हैं. अब नये जमाने में युवा बहुत विधि-विधान को नहीं जानते हैं. करम देव तभी प्रसन्न होंगे जब विधि-विधान का पालन होगा. इस पर ध्यान देने की जरूरत है. परंपरा, संस्कृति, भाषा को जानना होगा.
मोगो पाहन, कल्याणपुर मौजा
करम डाल भी खरीदने लगे हैं
अभी समय के साथ थोड़ा परिवर्तन भी आया है. शहर में कई लोग बाजार से खरीदकर करम डाल लाते हैं अौर त्योहार मनाते हैं. जबकि करम डाल को विधि विधान पूर्वक पेड़ से काटकर लाया जाता है अौर उसकी स्थापना होती है. हमारे पूर्वजों को प्रकृति पर आस्था थी. हमारे सभी पर्व प्रकृति से ही संबंधित है. करम भी प्रकृति से जुड़ा है. परिवार अौर पूजा में बैठने वाले सभी लोग 12 घंटों का उपवास रखते हैं. पूजा के दौरान करम देव से परिवार, समाज अौर गांव की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं.
प्रेम प्रकाश तिर्की, पाहन, हेहल
भक्ति भावना का अदभुत त्योहार
करम प्रकृति से जुड़ा हुआ, भाई-बहन के त्याग-तपस्या अथवा करम और धरम के आराध्य देवी-देवता के प्रति भक्ति भावना का अद्भुत त्योहार है. करम (भाई) और धरम(बहन) का प्रतिरूप है. प्रत्येक वर्ष करम वृक्ष रूपी देवता की दो डालियों को पूरे विधि-विधान के साथ आंगन में गाड़ा जाता है. पूजा के पवित्र अवसर पर उपवास रहते हुए करम डाली के किसी पत्ते को पूरी श्रद्धा के साथ दोनों हाथों में पकड़ते हुए बहन कहती है : आपन धरम, भाईक करम. फिर आगे अपना और अपने परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती है.
बहन का ऐसा कहना : अपना धरम और भाई का करम, इससे साबित होता है कि धर्म का प्रतिरूप बहन है और कर्म का प्रतिरूप भाई है. करम पूजा में खीरा, कुरथी आदि का प्रसाद वितरण किया जाता है. जिससे वर्षाकाल में होनेवाली पेट की बीमारी या पथरी को गलाने की शक्ति होती है. वह भी खाली पेट इस पवित्र प्रसाद को ग्रहण किया जाता है.
शरदचंद्र महतो, प्राचार्य, तमाड़ इंटर कॉलेज, तमाड़
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