रांची : परमवीर सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह नौ को कई कार्यक्रमों में लेंगे भाग, कारगिल युद्ध के हैं महानायक

Updated at : 07 Sep 2018 6:59 AM (IST)
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रांची : परमवीर सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह नौ को कई कार्यक्रमों में लेंगे भाग, कारगिल युद्ध के हैं महानायक

रांची : कारगिल युद्ध के महानायक परमवीर सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव सात सितंबर को बोकारो जाने के क्रम में रांची एयरपोर्ट पहुंचेंगे़ वहां झारखंड पूर्व सैनिक सेवा परिषद, पूर्व सैनिकों व राष्ट्र भक्त नागरिकों के द्वारा उनका भव्य स्वागत किया जायेगा़ परमवीर सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव ने 19 वर्ष की उम्र में ही […]

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रांची : कारगिल युद्ध के महानायक परमवीर सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव सात सितंबर को बोकारो जाने के क्रम में रांची एयरपोर्ट पहुंचेंगे़ वहां झारखंड पूर्व सैनिक सेवा परिषद, पूर्व सैनिकों व राष्ट्र भक्त नागरिकों के द्वारा उनका भव्य स्वागत किया जायेगा़ परमवीर सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव ने 19 वर्ष की उम्र में ही परमवीर चक्र प्राप्त किया था़ यह देश के पहले एेसे नायक हैं, जिन्हें इतनी कम उम्र में परमवीर चक्र से नवाजा गया.
परमवीर चक्र प्राप्त श्री यादव बाेकारो में आठ सितंबर को ‘गाथा एक शौर्य की’ कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे़ नौ सितंबर को वह रांची आयेंगे और उस दिन यहां आयोजित कई कार्यक्रमों में भाग लेंगे़ं यह जानकारी झारखंड पूर्व सैनिक सेवा परिषद के महासचिव अनिरुद्ध सिंह ने हरमू रोड गिरिधर प्लाजा स्थित परिषद के कार्यालय में पत्रकारों को दी़
खुली जीप में अलबर्ट एक्का चौक पहुंच करेंगे माल्यार्पण
अनिरुद्ध सिंह ने बताया कि परमवीर सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव नौ सितंबर को रांची आने के बाद दिन के दस बजे बूटी मोड़ स्थित युद्ध स्मारक के दर्शन करेंगे व श्रद्धांजलि देंगे़ चार बजे खुली जीप में अलबर्ट एक्का चौक पहुंचेंगे और वहां परमवीर अलबर्ट एक्का की मूर्ति पर 4:15 बजे माल्यापर्ण करेंगे़
परमवीर सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव की संक्षिप्त जीवनी
कारगिल युद्ध के इस महानायक का जन्म 10 मई 1980 को बुलंदशहर के औरंगाबाद अहीर गांव में हुआ था़ इनके पिता करण सिंह भी कुमायूं रेजिमेंट के एक सैनिक थे, जिन्होंने 1965 व 1971 का युद्ध लड़ा था.
इनके भाई भी फौज में थे़ पिता व भाई से युद्ध की कई कहानियां सुनी थीं, उसी समय से फौज में जाकर अपने देश की सेवा करने के लिए उनका मन मचलने लगा था़ 16 वर्ष पांच महीने की अल्प आयु में वह सेना के 18 ग्रेडीनियर में भरती हुए़
सेना में रहने के कुछ वर्षों की उनकी कई रोचक गाथाएं हैं. एकबार उन्होंने शत्रुओं से ऐसी लड़ाई लड़ी थी कि बुरी तरह घायल हो गये थे. उन्हें पाकिस्तानी सेना ही नहीं अपनी सेना भी मृत मान चुकी थी़ मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र देने की घोषणा की गयी थी, लेकिन वे अस्पताल में जी उठे, यह ईश्वर का एक करिश्मा था़
डेढ़ दर्जन गोलियां लगी, फिर भी टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया : उनके शरीर से डेढ़ दर्जन गोलियां निकाली गयी थीं. 1000 फीट की ऊंचाई की चोटी पर रस्सियों के सहारे चढ़े़ वहां जाकर शत्रु के बंकर को ध्वस्त किया और चार दुश्मनों का सफाया किया़
इस दौरान उनकी छाती व गले में तीन-तीन गोलियां लगीं. इसके बावजूद उन्होंने पुन: 60 फीट की सीधी चढ़ाई चढ़ी और दुश्मन के बंकर में ग्रेनेड फेंक कर फिर चार दुश्मनों को मार गिराया. इनके इस अपूर्व साहस व शौर्य कृत्य के कारण ही हमारे कमांडो पलटन के जवानों ने टाइगर हिल के शिखर पर पहुंच कर तिरंगा फहराने में सफलता पायी़
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